- ⁘ प्रचार एवं प्रदर्शन :- इच्छित वस्तु की सामान्य जन-जाति के मन-बुद्धि में अवगाहन कराने हेतु प्रस्तुत प्रक्रिया के भाषात्मक प्रयोग ही प्रचार है तथा कला एवं भाषा सहित प्रयुक्त प्रयास ही प्रदर्शन है ।
- ⁘ विधि :- एक या अनेक व्यक्तियों द्वारा अखण्ड समाज व सार्वभौम व्यवस्था को अक्षुण्ण रखने के उद्देश्य से व्यवस्था प्रदान करने हेतु निर्णीत नियमपूर्ण पद्धतियों की विधि संज्ञा है ।
- ⁘ व्यवस्था :- विधि के आशय को कार्यरूप प्रदान करने हेतु प्रस्तुत परंपरा ही व्यवस्था है ।
- ● सहअस्तित्व सहज परंपरा के बिना सामाजिकता का निर्वाह नहीं है ।
- ● सहअस्तित्व में निर्विरोध, निर्विरोध पूर्वक जागृति, जागृति पूर्वक समाधान-समृद्धि, समाधान-समृद्धि पूर्वक सुख-शांति, सुख-शांति पूर्वक स्नेह, स्नेह पूर्वक विश्वास, विश्वास पूर्वक सहअस्तित्व बोध होता है व सहअस्तित्व में बोध, अनुभव प्रमाणित होना ही जागृति है ।
- ⁘ सहअस्तित्व :- परस्परता में शोषण, संग्रह एवं द्वेष रहित तथा उदारता, स्नेह और सेवा सहित व्यवहार, संबंध व संपर्क का निर्वाह ही सहअस्तित्व है ।
- ⁘ निर्विरोध :- न्याय एवं धर्म के प्रति निश्चय, निष्ठा एवं अभ्यास ही निर्विरोध है ।
- ⁘ समृद्धि :- अभाव का अभाव ही समृद्धि है अथवा उत्पादन अधिक, अर्थात् आवश्यकता से अधिक उत्पादन ही समृद्धि है ।
- ⁘ सुख :- न्यायपूर्ण व्यवहार एवं धर्मपूर्ण विचार (समाधान) का फलन ही सुख है ।
- ⁘ स्नेह :- न्यायपूर्ण व्यवहार में निर्विरोधिता का फलन ही स्नेह है । यह जागृत जीवन में वृत्ति से अनुरंजित मन की क्रिया है ।
- ⁘ विश्वास :- परस्परता में निहित मूल्य प्रत्याशा के निर्वाह क्रिया ही विश्वास है ।
- ⁘ सेवा :- उपकार कर संतुष्ट होने वाली प्रवृत्ति एवं प्रतिफल के आधार पर किया गया सहयोग सहकारिता सेवा है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द