- ⁘ जड़ :- विचार पक्ष से रहित इकाई, जिसका कार्य क्षेत्र उसके लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई तक ही सीमित है ।
- ⁘ चैतन्य :- जिस इकाई का कार्य क्षेत्र उसकी लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई से अधिक हो तथा जिसका विचार पक्ष सक्रिय हो ऐसी इकाई की चैतन्य संज्ञा है ।
- ● ऐसी विशेष सक्रियता प्राप्त होते ही वह इकाई आशा के बंधन से युक्त हो जाती है । प्रमाण हर जीव में जीने की आशा है ही ।
- ● जड़ एवं चैतन्य इकाईयों में गठन सिद्धांत में साम्यता पाई जाती है ।
- ● आत्मा में अनुभूति; बुद्धि में उल्लास व आप्लावन; चित्त में आह्लाद; वृत्ति में उत्साह तथा मन में कौतूहल ही विकास की ओर सक्रिय होने की मूलभूत ऊर्जा नियोजन रीति है । इसके लिए ऊर्जा का अन्तर नियामन आवश्यक है ।
- ⁘ अनुभूति :- अनुक्रम से प्राप्त समझ, स्थिति-गति, प्रकटन व परिणाम ही अनुभूति है।
- ⁘ आप्लावन :- निर्भ्रमता के प्रभाव की आप्लावन संज्ञा है । बुद्धि ही निर्भ्रमता को प्राप्त कर आप्लावित होती है ।
- ⁘ आह्लाद :- अभाव का अभाव ही आह्लाद है । चित्त में ही अभाव के अभाव की प्रतीति होकर आह्लाद होता है ।
- ⁘ उत्साह :- उत्थान या विकास की ओर जो साहस है, उसकी उत्साह संज्ञा है तथा यह वृत्ति में होता है ।
- ⁘ कौतूहल :- अज्ञात को ज्ञात करने, अप्राप्त को प्राप्त करने हेतु संवेग की क्रिया कौतूहल है । जो मन में होता है ।
- # प्रत्येक परमाणु में परमाणु अंशों की अवस्थिति मध्य में तथा परिवेशों में पायी जाती है । प्रथम परिवेश में एक या एक से अधिक अंश, उसी प्रकार द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ आदि परिवेश में भी एक या एक से अधिक अंशों को पाया जाता है, जो मध्यांश के सभी ओर अविरत रूप से भ्रमणशील है । प्रत्येक परमाणु के सभी ओर तथा परमाणु के गठन में पाए जाने वाले अंशों के सभी ओर शून्य की स्थिति पाई जाती है । शून्य से रिक्त व मुक्त स्थान या वस्तु नहीं है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द