- ● आकृति को रूप, प्रभाव को गुण, वस्तुस्थिति को तत्व तथा किसी रूप, क्रिया, वस्तु व स्थान को निर्देश करने हेतु प्रयुक्त शब्द की ‘नाम’ संज्ञा है ।
- ● रूप एवं गुण सापेक्ष और सामयिक तथ्य है ।
- ⁘ सामयिक तथ्य :- किसी क्रिया या क्रिया समुच्चय का परिणाम भावी है, उसकी सामयिक तथ्य संज्ञा है ।
- ● समस्त तत्व निरपेक्ष में संपृक्त कार्यरत है ।
- ● भाषा के मूल में भाव; भाव के मूल में मौलिकता; मौलिकता के मूल में मूल्यांकन; मूल्यांकन के मूल में दर्शन; दर्शन के मूल में दर्शक; दर्शक के मूल में क्षमता, योग्यता एवं पात्रता; क्षमता, योग्यता एवं पात्रता के मूल में सत्य भास, आभास, प्रतीति; भास, आभास, प्रतीति के मूल में भाषा है । यह सब चित्त की क्रिया है जो दर्शक के जागृति के अनुसार सफल है अथवा असफल है ।
- ● पदार्थावस्था एवं प्राणावस्था की सृष्टि मेधस रहित तथा जीवावस्था व ज्ञानावस्था की सृष्टि मेधस सम्पन्न है ।
- ⁘ मेधस :- चैतन्य इकाई की इच्छाओें एवं आकाँक्षाओं के संकेत को ग्रहण करने योग्य क्षमता, योग्यता और पात्रता सहित सप्राण अंग ही मेधस है, जिसकी अवस्थिति साम्यत: मानव के शिरोभाग में पाई जाती है ।
- ● ‘जीवन पुंजस्थ’ आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा तथा प्रमाणिकता (प्रमाण) का प्रसारण (संकेत ग्रहण) मेधस पर ही है, जिसके अनन्तर ही ज्ञानवाही एवं क्रियावाही प्रक्रियाएँ हर मानव शरीर में पाई जाती है जो मानव परंपरा में परावर्तित होता है ।
- ⁘ पुंज :- चैतन्य इकाई सहज कार्य सीमा सहित जो आकार है, उसे पुंज की संज्ञा है । ऐसे पुंज के मूल में एक ही गठनपूर्ण परमाणु का अस्तित्व है जिसमें ही आत्मा, बुद्धि, चित्त, वृत्ति तथा मन की क्रियाएँ दृष्टव्य हैं ।
- ⁘ प्रसारण :- आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा एवं प्रमाणिकता सहज प्रमाणों के संकेत से मेधस तंत्र पर प्रभाव डालने हेतु प्रयुक्त तरंग की प्रसारण (संकेत ग्रहण) संज्ञा है, जिसमें प्रत्याशा का होना आवश्यक है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द