- ● ग्रहण, विसर्जन, निग्रह, अनुग्रह, संग्रह एवं उदारता के भेद से ही समस्त सुखाकाँक्षाएं हैं ।
- ⁘ ग्रहण :- उपयोगिता के मूल्यांकन की ग्रहण संज्ञा है ।
- ⁘ विसर्जन :- अनुपयोगिता की विसर्जन संज्ञा है ।
- ⁘ निग्रह :- स्वसंयमता के अर्थ में प्रवृत्ति ।
- ● आशाएँ आस्वादन के रूप में; विचार प्रसारण के रूप में; इच्छाएँ (काँक्षाएं) प्रयोग एवं व्यवहार के रूप में तथा ऋतम्भरा दृढ़ता एवं निष्ठा के रूप में व्यक्त है । यह क्रम से मन, वृत्ति, चित्त और बुद्धि से प्रदर्शित होने वाले गुण, स्वभाव सहित क्रिया पक्ष है अर्थात् मन से आशा, वृत्ति से विचार, चित्त से इच्छा (काँक्षा) और बुद्धि में अनुभव प्रमाण ऋतम्भरा क्रियाएँ हैं ।
- ● हर चैतन्य इकाई दृष्टि संपन्न है । जड़ परमाणु विकासपूर्वक चैतन्य (जीवन) परमाणु होते तक दृष्टि सम्पन्न नहीं है ।
- ● अपने दृष्टि के द्वारा दृश्य को देखने हेतु दर्शक द्वारा प्रयुक्त क्रिया एवं प्रक्रिया ही दर्शन है, जिसकी उपलब्धि अर्थात् दर्शन की उपलब्धि समझ या ज्ञान है । ज्ञान से ही स्व एवं परस्परता का निर्णय तथा अनुभव एवं अभिव्यक्ति है । जागृत मानव में स्वयं होने का बोध व संपूर्ण अस्तित्व होने का बोध होता है । यही स्व एवं परस्परता है ।
- # अपने वातावरण में स्थिति पूर्ण-अपूर्ण, रूप-गुण-स्वभाव-धर्म, योग-वियोग, क्रिया-प्रक्रिया, परिणाम-फल, ह्रास और विकास का संकेत ग्रहण दर्शन द्वारा ही दर्शक ने किया है ।
- ● चैतन्य इकाई स्वयं जीवन पुंज-मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि व आत्मा का अध्ययन है ।
- ⁕ इसके पूर्व अमानवीयता और अतिमानवीयता का वर्गीकरण स्वभावात्मक व व्यवहारात्मक भेद से किया जा चुका है । मानव जाति पाँच श्रेणियों में परिलक्षित है, जो निम्नानुसार हैं :-
- # अमानवीय मानव के दो वर्ग हैं :- (एक) पशु मानव और (दो) राक्षस मानव ।
- ● पशु मानव में दीनता प्रधान, हीनता एवं क्रूरता वादी कार्य व्यवहार होता है ।
Table of contents
Jump to any page
-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द