भी हम जूझे रहते हैं, हम कितना अपराधी हैं, एक सोचने की मुद्दा है। ये सोच सकते हैं? कितना भयंकर अपराध के लिए हम तुल गए हैं। ये भी साथ-साथ सोचा जाता है, अपराध से, अपराध विधि से, अपराध की सोच से, अपराध प्रवृति से, आदमी सुखी नहीं हो सकता। यद्यपि न्याय अभी आदमी की समझ में नहीं आया, ये भी सच्चाई है। मेंने इसको अच्छी तरह से आजमाया है, supreme court के जो प्रधान judges होते हैं, उनके साथ 3-3 लोगों से हम बात किये। supreme court को न्याय की पता नहीं। न्याय supreme court नहीं जानता है, किन्तु न्यायालय लिखा रहता है।

उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय, न्यायालय ऐसा लिखे रहते हैं। मैंने उनसे पूछा न्यायालय काहे को लिखते हो? बोले लिखने की क्या है? “शिव भोजनालय” शिव कहाँ रहता है वहाँ? ऐसा बोलते हैं वो। फिर मैं पूछा कि न्याय मूर्ति काहे को कहलाते हो? वो बोले:हमारे यहाँ तो परंपरा है, दरिद्र आदमी का कुबेर नाम होता ही है, ऐसा वो बोलते हैं। तो ये नाम के पास आप मत जाइये, संबोधन के पास मत जाइये, supreme court में कोई न्याय का रूप रेखा हम यदि दावा करें, supreme court दावा करें कि हम न्याय जानता हूँ, नहीं, वो चीज़ नहीं, धरती में जितने भी supreme court हैं किसी के पास न्याय का स्वरूप नहीं है। इसके बावजूद न्याय विरोधी कार्य से आदमी सुखी नहीं हो सकता है, इसकी घंटी, घर-घर में, जन-जन में बजाई जाती है। इसीलिए प्रकृति विरोधी कार्य करके हम सफल होने की सोचना, एक शेखचिल्ली की बात है, ऐसे काम को करना नहीं चाहिए। ऐसा मेरा सोचना है।

प्रश्न : जर्सी गाय का वंश परंपरा स्थिर नहीं होने के कारण, उसका दूध पे क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर : दूध के साथ ये कुप्रभाव पड़ता है, जब वंश ही स्थिर नहीं है, उनका रसों का संतुलन तो हो ही नहीं सकता, उस परंपरा का। रस ही जब संतुलित नहीं है, असंतुलित रस परंपरा में बनी हुई दूध से, आदमी कैसा ठीक होगा? यदि आदमी पीता भी है वो ठीक आदमी कैसा होगा? जितना इस प्रकार की असंतुलित, प्रकृति विरोधी रसों से यदि हम आदमी पलना चाहते हैं, उतना ही अपराधिक प्रवृत्ति में ही वो जाएगा, उससे कम तो होगा नहीं। जब कि अपराध अभी ठीक से अपने को समझ में नहीं आया है, क्योंकि अभी कितने भी अपराध संहिता लिखा गया है, जो प्रकार लिखा गया है, वो भी कभी-कभी ऐसा लगता है, ये पूरा लिखा नहीं गया है। नया-नया प्रकार के अपराध निकल जाते हैं। इस प्रकार से आदमी अपराध को शोध करने में और नया अपराध करने में प्रवृत्त हो सकता है, न्याय तो होना नहीं है।

इसीलिए प्रकृति सहज विधि से मानव का अवस्थिति इस धरती पर हुई है, संकर विधि से ये आया नहीं है। कैसा आया है? प्रकृति सहज विधि से इस धरती पर मानव का अवतरण है। जो प्रकृति विरोधी विधि से मानव का अवतरण नहीं है, प्रकृति विरोधी विधि से कोई भी द्रव्य को कोई भी वस्तु को मानव सेवन करेगा, अपराध करेगा की न्याय करेगा? न्याय की भले अभी पता नहीं है, आगे पता लग जाए, ये आशा तो है ही। उसके योग्य होने के लिए कहीं ना कहीं, प्रकृति सहज विधि से हमको चलने की आवश्यकता है। प्रकृति विरोधी विधि हमारे लिए कल्याणकारी नहीं है।

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