2. भार एवं बल - 1

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मुख्य मुद्दा ये रहा - जो तरल, विरल और ठोस पदार्थ सहअस्तित्व में अपने वैभव को निरंतर प्रकाशित करना चाहते हैं, इस बात पर अपन आ गए। भार का प्रदर्शन कैसा होता है, ये भी आप को बताया। ये धरती में जितने भी छोटे-छोटे रचनाएँ हैं - पत्थर, कंकड़, लकड़ी, पानी,पिंगर - सब कुछ - वो अपने भार को इसी विधि से प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि तरल तरल के साथ रहना चाहते हैं। इस कारण से वो अपने भार को उसी सहअस्तित्व की बिल्कुल सूत्र से सूत्रित हो कर भार को व्यक्त करते हैं। भार को कैसे व्यक्त करते हैं? सहअस्तित्व सूत्र से सूत्रित हो कर अपने भार को व्यक्त करते हैं। जिसको आप हम तोल कहते हैं। ऐसा आप करते ही हो। उसी भाँति ऊपर से कोई चीज़ गिरता है, वो ठोस ठोस के साथ ही, माने सहअस्तित्व में होने के लिए, दौड़ के आता है, प्यार से। उसी भाँति तरल तरल वस्तु के साथ होने के लिए सहअस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए ऊपर से नीचे आता है। आप इसको जानते हो ढ़ाल के ओर पानी जाता है। काए को जाता है पानी? पानी के पास जाने के लिए पानी जाता है - इतना बात तो मूर्खों को भी समझ में आता है।

तो इसी भाँति और एक अचरज की बात है, कितने भी 200 फुट, 400 फुट, 500 फुट नीचे कोई भी विरल वस्तु को उत्पादित करें, वो आपका किसी का बात नहीं मानेगा, वो ऊपर ही जाएगा। आपके पास ऐसा कोई भी औकात नहीं है, तमीज़ नहीं है -उसमें भार नहीं है, ऐसा बताने का। विज्ञान संसार के पास ऐसा कोई तमीज़ नहीं है बताने का, विरल वस्तु में भार नहीं हैं। भार रहता ही है, क्योंकि वो अणु समूह ही है, उसमें भार होता ही है। वो भार क्या चीज़ है? विरल वस्तु के साथ विरल वस्तु सहअस्तित्व को प्रकाशित करता है। वो प्रसन्नता का व्यक्त करता हे।क्या प्रसन्नता? व्यवस्था में भागीदारी की प्रसन्नता है। एक परमाणु में भी यही ध्वनि निकलती है, वो व्यवस्था में ही सभी वस्तु आश्वस्त होना चाहते हैं,अपने प्रकाशमानता को निरंतर बुलंद बनाए रखना चाहते हैं, ये बात ऐसी है।

उससे अपने को ये प्रेरणा मिलती है, मनुष्य को भी व्यवस्था में जीने की जरूरत है। अभी तक मनुष्य व्यवस्था में जिया नहीं, ये बात सही है। उसका प्रमाण यही है, मनुष्य जितना भी किया है, आबादी से बरबादी ज्यादा किया। एक ही बात में आबादी दिखाई पड़ती है, जनसंख्या वृद्धि। बाकि सब करतूत बरबादी की ज्यादा है, आबादी की कम है। आबादी में और क्या दिखा? दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन, जो यंत्र तंत्र हमको हासिल हो गया। ये एक आबादी है, बाक़ी सब बर्बादी है। ऐसा देखने को मिला।ठीक है यदि ठीक से ये मन में आता है, हमको ये पीड़ा होना चाहिए कि हम व्यवस्था को पहचानें, व्यवस्था में जीवें, व्यवस्था में प्रमाणित होवें, हम सुख पूर्वक जीने के लिए दूसरों को सुखी बनाने की आवश्यकता है, इस बात को निश्चयन करें। यही एक सुखद रस्ता का आसार बनता है। ऐसा मैंने देखा है, मैं समझा है, हम जीने का उपक्रम में हम समाज व्यवस्था में ही जीता हूँ। मैं अपने में प्रमाणित हूँ। बाक़ी प्रमाणित होना चाहते हैं, नहीं चाहते हैं, इसका तो आप ही निश्चय करोगे।

ये बात कुल मिला करके जिसको हम भार कहते हैं, गुरूत्वाकर्षण कहते हैं, ये सब का व्याख्या क्या है? यदि सकारात्मक पक्ष में हम सोचते हैं तो? व्यवस्था में प्रकाशित होने की ही प्रणाली में ये सब प्रदर्शन है। जैसा ऊपर से

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