17. Darwin का विकासवाद

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प्रश्न : Darwin का विकास वाद?

उत्तर : Darwin का विकास पूरा का पूरा शरीर से संबंधित है। शरीर को वो विकास मानते हैं। शरीर को ही यदि विकास मानते हैं, अच्छा रचना तक यदि उसको सीमित रखा जाए, वहाँ तक तो ठीक है। उसी में मानव यही है, ये कहने जाते हैं, ये तो भ्रमित परंपरा की ही काम है। शरीर को जीवन मानने की क्रम में ही है ये। अभी तक आदमी जात शरीर को ही जीवन मान करके तो चल ही रहा है। जीवन ज्ञान से इसका परिहार्य है। जीवन ज्ञान के बाद ही शरीर और जीवन का निश्चित कार्य, नियत कार्य, नियति क्रम कार्य अपने को बोध हो पाता है। उसके पहले तो होने वाला नहीं है ये।

प्रश्न : ये जो माना जाता है, मनुष्य बंदर से पैदा हुआ है?

उत्तर : इसके बारे में ये सोचा जा सकता है, ये बात सही है, ये बात को सही ढंग से सोच जा सकता है। प्राणकोषाओं में प्राणसूत्र में जो रचना विधियाँ बदलती आती हैं, स्वयं स्फूर्त विधि से, रासायनिक उर्मि के आधार पर, उसी आधार पर मनुष्य रचना का भी उभर के आ गया। उसमें ये ज़िद करना बेकार है, बंदर की पेट से ही आदमी आया। बंदर ही परिवर्तित हो करके आदमी बन गया। दो प्रकार की सूझबूझ है ये। बंदर के पेट से आदमी पैदा हुआ, दूसरा बंदर ही बदल बदल करके धीरे धीरे आदमी हो गया। ये दो प्रकार की सूझ है। तो इसमें बंदर की पेट से आदमी आया वो ज्यादा युक्ति संगत है। क्योंकि रचना विधि जब बदलती है, भिन्न प्रकार की रचना होती ही है।

क्योंकि इतना लाखों प्रकार की प्रजातियाँ रचना विधि बदल करके तो रचना हुई है। उसी क्रम में मानव शरीर रचना भी चाहे गाय का पेट में हो, चाहे मछली की पेट में हो, चाहे सिंह के पेट में हो, चाहे बंदर के पेट में हो, किसी ना किसी जानवर का पेट से ही मानव प्रजाति शुरूआत किया है। ये इसको मान सकते हैं, इसमे किसी को कोई तकलीफ भी नहीं है। वो प्रजाति होने के बाद उस प्रजाति का परंपरा होना शुरू हो जाता है। जैसा एक प्रजाति की धान आदमी ने प्राप्त कर लिया, दूसरा प्रजाति का धान प्राप्त कर लिया, वो परंपरा बन गया है कि नहीं है? इसी भांति मानव भी अपने प्रजाति में एक परंपरा बनने की पहले, किसी ना किसी जीव जानवरों के पेट से, ये इस प्रजाति की शरीर रचना हो चुकी। उसके बाद ये अपने स्वतंत्र परंपरा बनते आए।

प्रश्न : बाबा अभी जैसे कहते हैं कि बंदर की एक प्रजाति हुई जिन्होंने अपने पूँछ का उपयोग नहीं किया, तो अगले पीढ़ी में पूँछ और छोटी हो गई, उससे अगली पीढ़ी में और छोटी हो गई। इस प्रकार से कई पीढ़ी में पूँछ बंद हो गई?

उत्तर : वोही तो बातया ना, बंदर धीरे-धीरे आदमी हुआ, उसको बताने की क्रम में है ये। तर्क से तो कुछ लाभ होता नहीं है, किन्तु मानव का अवतरण हुआ है ये सच्चाई है। मानव प्रजाति की शरीर रचना का एक प्रजनन विधि बन चुकी है, ये भी पता है। ये भी पता है गर्भाशय में ही मानव शरीर रचना का भी संभावना और तरीका बनी हुई है। यहाँ

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