11. ज्योतिष शास्त्र एवं किरणें
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ज्योतिष शास्त्र के बारे में, बहुत प्राचीन समय से बातचीत चलती ही है, ज्योतिर्विदों के बारे में बहुत कुछ सोचा जाता है - भविष्य को बतायएँगें, अच्छी चीज़ों को बतायएँगें, उपाय बताएगें, येन-तेन। इस विधि में एक ज्योतिष को सुनने की एक इच्छा तो संसार में बनी ही है। ज्योतिष को जानने मानने की प्रबल इच्छाएँ मानव परंपरा में तो आज भी देखने को मिल ही रहा है। पेपरों में भी लिखते हैं, और भी करते हैं, बहुत सारे लोग ज्योतिष के बारे में जुड़े भी हैं। मूल में ज्योतिष का मूल रूप क्या है? उसके बारे में मैंने जो देखा है वो ये है - ब्रह्माण्डीय किरण का संचार तो होते ही रहता है। उसके होते हुए जो निश्चित ग्रहों को इस सौर व्यूह में पहचानी गई है, उन ग्रहों के माध्यम से, वो किरण कैसा काम करता है। जैसा, सूर्य के माध्यम से ब्रह्माण्डीय किरण कैसा काम कर रहा है।
बुद्ध एक ग्रह है, उसके माध्यम से कैसा ये काम कर रहा है, दूसरे ग्रह मंगल के माध्यम से कैसा काम कर रहा है, और उसी प्रकार चन्द्रमा के माध्यम से कैसा काम कर रहा है – इसको पहचानने की विधियों को हम ज्योतिष शास्त्र कहते हैं। और इसको पहचानने की क्रम को एक गणितीय विधि से, इस बात को पहचाना गया कि जो अक्षांश-रेखांश के संयोग से एक वर्ग को - छोटे से छोटे, बड़े से बड़े वर्ग को - पहचानने की विधि तैयार कर लिया। उस वर्ग में, उस समय में कैसे ग्रहों का, किरण का प्रभाव रहता है, उसका अध्ययन है ये। उससे होने वाले फला-फलों को बताने के लिए, माने सही फलों को या गलत फलों को दोनों को, बताने की सोच करता है। इसके आगे, इसके आधार पर ज्योतिषी भी यही मानता है, ये ज्योतिष तंत्र के साथ ही सारे मानव तंत्रित हैं, ऐसा शुरू कर देते हैं। ये शुरू किया है। जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। तो शरीर के ऊपर जो ब्रह्माण्डीय किरणों का फल होता है, प्रभाव होता है, परिणाम होता है, जीवन के ऊपर ग्रहों का, इन ब्रह्माण्डीय किरणों का एक भी प्रवाह नहीं है, एक भी प्रभाव नहीं है, एक भी परिणाम नहीं है, ये होता है शरीर के ऊपर ही सारे फल परिणाम हो पाते हैं।
प्रश्न : ब्रह्माण्डीय किरण क्या चीज़ है बाबाजी ?
उत्तर : ब्रह्माण्डीय किरण ये चीज़ है, जैसा हमारा धरती है, इस धरती से विकिरणीय जो प्रवाह है, वो सतत् निःसृत होता ही रहता है। वैसे ही कई ग्रहों से विकरणीय प्रवाह बहती रहती है। इसको ब्रह्माण्डीय किरण हम कहते हैं। ये प्रवाह कभी भी बंद होते ही नहीं। ये ग्रह गोल में जितना विकसित रहता है, उतना ही ज्यादा उसमें से विकिरणीय प्रवाह बर्हिगत होता ही रहता है, हर ग्रहों से विकिरणीय प्रभाव रहता ही है, इसमें दो राय नहीं। इस प्रकार से ब्रह्माण्डीय किरणों का स्वरूप, विकिरणीय प्रवाह के स्वरूप में हम पहचान सकते हैं, विकिरणों का जो प्रवाह किसी धरती के, किसी ग्रह गोल के माध्यम से वो हर एक अक्षांश-रेखांश की वर्ग को बताया, उस वर्ग में कैसा प्रभाव पड़ता है, उसका गणना करना ही ज्योतिष का मतलब है।
उस वर्ग में जो आदमी पैदा होता है, और जीवित रहता है, और उनके शरीर पर कैसा काम करता है, इसको लोग बताते हैं, उसी से रोग-राटा, येन-तेन बात बताते हैं, उसके परिहार के लिए कुछ उपाय भी बताते हैं। इस ढंग से