व्यक्ति बेवकूफ नहीं होगा, काम को चोरी करें। अभी कोई ऐसा आदमी नहीं है,100 मे सती को छोड़कर के, बाकी सब काम करने मे चोरी ही करता है। ये दोनों के अंतर क्या है? समझदार परंपरा और नासमझ परंपरा की इतना ही अंतर है। समझदार परंपरा में अपने काम करने के लिए दूसरे को बोलना नहीं पड़ता है, नासमझ परंपरा में बैल जैसा कोंचते रहा तबहु ना करें। हाँ, ये सब देखे गए है भाई। अब क्या किया जाय! अब आदमी नहीं काम करेगा, इसको स्वीकारते हुए यंत्रों को बनाया गया है। जोतने की काम भी वहीं से है, कातने की काम भी वहीं से है, बुनने की काम भी वहीं से है, अब घड़ा बनाने को भी मशीन बनाएगें ऐसा कहत रहे भाई, वहाँ polytechnic में, ऐसा नहीं कहते थे? घड़ा बनाने का मशीन बनाएंगे। ये सब ऐसा कहते ही हैं। अब steel का बर्तन बनाने का machine तो बहुत सारा बना ही चुके हैं।

अब क्या करोगे! आदमी करता ही नहीं तो क्या करते? व्यापार विधि से कोई चीज़ रुक नहीं सकता, production ज्यादा चाहिए। अब क्या हो गया, जो production ज्यादा होता है, आदमी कम करता है काम। ठीक है, production ज्यादा है, आदमी को सब चीज़ चाहिए, पहले चार चीज़ से आदमी जीता रहा, अभी 400 चीज़ चाहिए, आदमी काम नहीं करता है। इसमें परेशानियाँ होगा कि नहीं होगा भाई। ये आप स्वयं गणित लगा लीजिए। आदमी काम करना नहीं है, उत्पादन के साथ जुड़ना नहीं है, हाथ गंदा करना नहीं है, पैर गंदा करना नहीं है, और उसके बाद आवश्यकता जो है ना पहले 4 से हम जीते रहे 60 बरस पहले, आज के date में 400 चाहिए, अब क्या किया जाए? हम अच्छे ढंग से सोच कर के ये 400 चीज़ को ला पायेंगे, सही चीज़ सोच कर के क्या हम ये 400 चीज़ लायेंगें, गलत चीज़ सोचकर हम ला पायेंगे? सोच लीजिए आप। माने यंत्र वहाँ से शुरू हुआ है, मनुष्य से अविश्वास होने के बाद। शुरुवात ही वहाँ से है। अब युद्ध भी कहाँ से शुरू हुआ, मनुष्य के साथ मनुष्य का अविश्वास। मनुष्य के साथ, मनुष्य का विश्वास की दिन को पैदा ही नहीं कर पाए हैं, अभी तक, जंगल युग से आज तक, दुर्घटना, यहाँ है। ठीक है।

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