तक सर्व मानव को विदित है। तो ये जो परंपरा बनने के बाद, पीछे जहाँ से शुरुआत होता है, जैसा कुम्हड़ा से तोरई पैदा हुआ, तोरई से कुम्हड़ा पैदा हुआ, इस प्रकार की हम तर्क में जाते है। उससे फायदा होता नहीं, ये बात सही है, एक के बाद एक हुआ है। इतने को स्वीकारने मात्र से ही, अपने को शुरुआत का जो एक कौतूहल होता है, उसका उत्तर पूरा हो जाता है।

प्रश्न : जीवन के प्रकाशन के क्रम में शरीर रचना है, धीरे-धीरे जीवन के प्रकाशन के आवश्यकता अनुसार धीरे-धीरे बदल के इस shape में आया, ऐसा कहना ज्यादा तर्कसंगत लगता है।

उत्तर : जीवन ही तो आवश्यकता को भोगता है, आवश्यकता जीव शरीर से ही शुरू हुई। अनेक जीव शरीर कैसा बना है? आवश्यकता के आधार पर तो हुआ ही है। अनेक प्रजाति की जीव शरीरें बन चुकी, उसमें जीवन की तृप्ति हो नहीं पाया और मनुष्य शरीर रचना हो चुकी, इसमें तृप्ति की स्थली को खोजता आया है, अभी तक पाया नहीं है, बात इतना ही है। उसको पाने की काम में अपन काम करें, वो ज्यादा लाभदायी है।


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