12. ध्वनि और रंग

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प्रश्न : ध्वनि में एक कण कंपन होता है, उसके बाजू में दूसरा कण में कंपन आता है, उसके बीच में जबकि सत्ता है, ये किस विधि से कंपन होता है?

उत्तर : दबाव विधि से। ताप भी दबाव विधि से ही पैर को आगे-आगे रखता है। ध्वनि भी दबाव के आधार पर ही आगे-आगे पैर रखता है।

प्रश्न : एक कण और दूसरे कण के बीच में, इस कण में जो कंपन है, ध्वनि है, वो इस कण तक कैसे पहुँच जा रहा है, बीच में सत्ता है, तो ये कण स्वीकार ले रहा है?

उत्तर : इस कण, उस कण के बीच सत्ता है, इस कण में जो कंपन है, उसको वो स्वीकारा ही है। क्योंकि इसका प्रतिबिम्ब उसका ऊपर है ही है।

प्रश्न : दबाव विधि कैसे, दबाव विधि मानें?

उत्तर : ये जो कंपन होता है, दबाव है। आवेश, वो आवेश जो है ना इसमें पहुँचता है, ये भी अपना वैसे ही पंख हिलाता है तो दूसरे के पास पहुँचता है।

प्रश्न : इसमें पहुँचता है या ये स्वयं उसको स्वीकार लेता है?

उत्तर : स्वीकारने को बैठा ही रहता है, ये पहुँचता भी है, ऐसा योग है ये। तभी तो नृत्य बनता है, ये स्वीकारने वाला, यह पहुँचने वाला, दोनों होने पर नृत्य होता है।

प्रश्न : जैसे एक व्यक्ति छत के ऊपर से धरती पर कूदता है, वो धरती के पास पहुँचता है या धरती उसके पास पहुँचता है?

उत्तर : ठोस-ठोस के साथ, विरल विरल के साथ, तरल तरल के साथ, सहअस्तित्व में होना चाहता है। ये आशय सभी ठोस वस्तु के साथ जुड़ा है। प्राचीन क़ालीन द्रवैय्या है, यथावत है।

प्रश्न : प्रश्न ये है, धरती हमको खींच रही है, इसके कारण हम नीचे जा रहे हैं, या स्वयं कूद के नीचे जाना चाह रहे हैं?

उत्तर : ठोस, ठोस के साथ पहुँचने की सिद्धान्त है ये। इसके खींचने वाला, खिचांने वाला कुछ भी नहीं है।

प्रश्न : छत भी तो ठोस है?

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