18. देसी गाय और संकर गाय

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प्रश्न : जीवावास्था से संबंधित कुछ जिज्ञासाएँ हैं, उसमें से देशी गाय, जर्सी गाय, का तुलनात्मक अध्ययन विस्तार से समझाइये?

उत्तर : ये संकर प्रणाली और स्वाभाविक रूप में वंश की बात है ये। किसी जीवों के साथ, अन्य जीवों को लेकर, संकरता को उत्पन्न करने की विधि से, जर्सी गाय के बारे में अभी सोचा जा रहा है, सोचा गया और जर्सी गाय को तैयार भी किया गया, तैयार करके लोगों को दिए भी हैं, किन्तु संकर जाति में ये देखा गया, वंश स्थिर नहीं हो पाता है। संकर तो कर देते हैं, किन्तु संकरता की स्थिरता अस्तित्व में नहीं होता है। शनैः-शनैः संकरता का क्षरण होते होते, वो पुनः जहाँ पहुँचना था, पहले किया था स्थिति था या उससे बदतर स्थिति है, वहाँ पहुँच करके अन्त हो जाता है। ये संकर प्रणाली स्वयं मनुष्य का एक अपराधिक मानसिकता है। संकर प्रणाली का सोच मानव परंपरा के लिए एक आपराधिक मानसिकता का द्योतक है। अपराध को सोचे बिना संकरता को सोचा नहीं जा सकता। इसको बारम्बार ये प्रकृति इस प्रकार से बताया है, संकरता तब तक वास्तविक नहीं हो सकता, वास्तविकता के सूत्र से जुड़ा हुआ संकरता ना हो। उसी को उन्नत माना जाए।

वंश का उन्नति या बीज का उन्नति तभी माना जाए, जब तक वो वंश और बीज परंपरा ना बन जाए। परंपरा जब तक नहीं बन सकती है, तब तक वो अपने आप में क्षरण होना पाया जाता है। अर्थात प्रकृति के लिए अस्विकृत होने का विधि ये स्पष्ट होती है। प्रकृति जब अस्वीकार करता है, उसको हम प्रस्तुत करते हैं, हम न्यायिक कब हुए? प्रकृति विरोधी जितने भी हम सुझबूझ तैयार करते हैं, अपने अनुसार बहुत बड़े भारी तीर मारे, ऐसे ही ना सोचते हैं, किन्तु वो तीरमारी कहाँ पहुँचा? वो क्या प्रकृति स्वीकारी? नहीं स्वीकारता है तो हम कहाँ न्यायिक हुए? न्यायिक नहीं हुए तो हम कहाँ, समाज के लिए, मानव के लिए उपयोगी कब बने? माने प्रकृति विरोधी हो करके हम मानव का उपकार करते हैं, ऐसा सोच के बहुत कुछ काम कर गए। इसीलिए प्रकृति के साथ अपराध करना, ये भी घोषणा करना, झूठी घोषणाएँ, हम मानव का उपकार कर रहे हैं। अभागा मानव ये भी सोचता रहा, बहुत सारा, ये बड़ा उपकार हो रहा है, जर्सी गाय आने से कई लोग ऐसा सोचे अवश्य हैं, ये बड़ा उपकार हुआ, ऐसा भी सोच गया, जबकी प्रकृति विरोधी है।

प्रश्न : प्रकृति विरोधी का आधार कैसे स्पष्ट होता है?

उत्तर : प्रकृति कहाँ स्वीकारा संकरता को? वंश परंपरा स्थिर नहीं हुआ। वंश परंपरा जब स्थिर नहीं होता है, तो प्रकृति कहाँ स्वीकारता है? बीज का परंपरा यदि स्वीकार नहीं होता है तो उन्नत बीज होने का कहाँ प्रमाण है? बीज को हम डालते हैं, और उससे जो दाना होता है, वो बीजा नहीं बनता है तो प्रकृति कहाँ स्वीकारा है। जो संकरता को हम तैयार करते हैं क्योंकि हम ज्ञानवस्था का इकाई हैं, अपराध भी कर सकते हैं, न्याय भी कर सकते हैं, इस अवसर को हम दुरूपयोग करते हैं, ठीक है दुरूपयोग किया, वो प्रकृति स्वयं उसको लात मार के अलग करता है, उसके बाद

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