6. आकर्षण, प्रत्याकर्षण और गति

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प्रश्न : आकर्षण तथा प्रत्याकर्षण से कंपन है, उसकी व्याख्या कर दीजिए?

उत्तर : इसको कहाँ देखा जाए, कैसा देखा जाए? कैसा समझा जाए? ये बात आता है। परमाणु में मध्यांश और आश्रितांश की बात आप हम स्पष्टतया समझ चुके हैं। जब कभी आश्रितांश, मध्यांश से दूर भागने लगते हैं, उनमें तो आकर्षण रहता ही है। किसमें ? मध्यांश से आश्रितांशों के साथ आकर्षण बल बना ही रहता है। ठीक है, इसीलिए नियंत्रित रहते हैं। वो नियंत्रण से बाहर जाने के स्थिति में, उसमें प्रत्याकर्षण होता है। कहाँ से? ये मध्यस्थ बल प्रत्याकर्षण के रूप में अपना बल को डालता है। उसमें आकर्षण निहित है ही है, आश्रितांशों में आकर्षित होने का धार निहित है ही है। वो पर्याप्त ना होने के आधार पर ये मध्यस्थ बल को प्रत्याकर्षण बल में नियोजित करता है। फलस्वरूप वो निश्चित अच्छी दूरी में वापस आ जाता है। दूसरा प्रक्रिया, वोही परमाणु में प्रक्रिया होती है, जो पास में आ जाते हैं। तो उस स्थिति में आकर्षण बल को, परमाणु में निहित जो बल होती है, वो प्रत्याकर्षण के रूप में परिवर्तित हो जाता है। माने अच्छे दूर में पहुँचने के लिए मध्यस्थ बल जो है ना विकर्षण बल को डालता है, तब ये प्रत्याकर्षण बल में परिवर्तित हो करके नियंत्रित हो जाते हैं। परमाणु के स्थिति में ये है।

तो व्यवहार में आकर्षण, प्रत्याकर्षण, ये क्या होता है? इससे कंपनात्मक गति पैदा होता है बताया। कंपनात्मक गति उत्सव है, कंपनात्मक गति सदा ही एक प्रकार से नृत्य है, नृत्य होना, खुशहाली का द्योतक है, नियंत्रित होने का द्योतक है, स्वभाव गति में आने का द्योतक है, हँसी का द्योतक है, खुशी का द्योतक है। ये ऐसा बनता है मानव भाषा में। उसी को मानव के संदर्भ में सोचा जाए, जब कभी भी हम किसी बात को, जैसा अभी बताया, परमाणु के बारे में, आकर्षण-प्रत्याकर्षण के बारे में बताया जिसके फलस्वरूप वो परमाणु में अपने आप से कंपनात्मक गति पैदा होता है, फलस्वरूप परमाणु अपने स्वभाव गति में होना पाया जाता है। ये चीज यदि मनुष्य को समझ में आता है, एक परमाणु और मनुष्य के परस्परता में एक सुखद सुंदर उत्सव होता है कि नहीं होता है? वो क्या हो गया अपने में? तो समझने मात्र से, समझ की वस्तु एक है “परमाणु”, उसकी और समझने वाली वस्तु की बीच में जो दूरी है, वो घटकर एक संगीतमय स्थिति में आते हैं, उसका नाम है, समझदारी।

यदि ये साक्षात्कार नहीं होगा, बोध नहीं होगा, अनुभव नहीं होगा, हमारे में वो खुशहाली होती नहीं। अध्ययन, बोध, अनुभव उसके बाद प्रमाणिकता की हालत आती है। हम अध्ययन से अध्ययन करने के क्रम में ये पहला आरंभिक वस्तु है “शब्द”, उसके बाद आता है, उसका परिपूर्ण “वस्तु”, शब्द से इंगित वस्तु। इंगित वस्तु हमारे स्मरण से चलकर साक्षात्कार में उदय होना, इसका नाम है पहला स्थिति। दूसरा स्थिति अध्ययन का, वो पूरा का पूरा स्वीकृत हो जाना, सदा-सदा के लिए जीवन में, इसी का नाम है संस्कार, बोध। वस्तु बोध हो गई, बोध होने के पश्चात होता है अनुभव। अनुभव किस बात के लिए है, प्रमाणित करने, बोध होने के बीच की तृप्ति बिन्दु का नाम है अनुभव। बोध को हम प्रमाणित करते हैं, और प्रमाणित करने का क्रिया और बोध क्रिया की बीच में जो तृप्ति बिन्दु है, इसका नाम है “अनुभव”। क्या बात है! इसमे आकर्षण प्रत्याकर्षण होता ही है। जैसा हम किसी वस्तु को देखने जाते हैं, नहीं तो

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