4. परमाणु में बल

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​​अभी धनाकर्षण, ऋणाकर्षण की बात से शुरू किए थे। आप इस बात को एक स्पष्ट रूप में देख सकें, इसका एक नज़ीर बताए थे। चुम्बकीय पत्थर को अथवा लोहा को लेकर हम कुछ दूर में रखने से, यदि वो छोटा-बड़ा रहने से, उस स्थिति में, एक में धनाकर्षण एक में ऋणाकर्षण प्रभावित होता है। ऋणाकर्षण जो रहता है, वो वस्तु स्थिर हो जाता है, वहीं रहता है। धनाकर्षण जिस में हुआ रहता है, वो धीरे-धीरे सरक करके उसमें जा के चिपक जाता है। आप कहीं भी दो चुम्बकीय पत्थरों को प्रयोग करके देख लीजिए। आपको भी दिखेगा, मुझको भी दिखेगा, जो थोड़ा सा अंधरा हुआ रहता है, उसको भी दिखेगा।आंध्र को बताओगे तो उसको भी समझ में आएगा। चुम्बकीय बल दो आपस के बीच में अपना धार बनाता है, उसमें कोई आवेश नहीं रहता।

प्रश्न :धार वस्तु के रूप में क्या हैं?

उत्तर : धार क्या चीज़ है? उसका प्रभाव क्षेत्र है, चुम्बकीय बल का प्रभाव क्षेत्र को हम धार कह रहे हैं। ये गति नहीं हैं, स्थिति है, प्रभाव क्षेत्र है। ये प्रभाव ही अभी जितने भी dynamo होते हैं, उसके आपस में सीधाई में जितने भी चुम्बकीय chips लगे रहते हैं, वो एक दूसरे के बीच में धार बना के रखते हैं। उसको घूमा करके हम काटते हैं। काट करके किसी अनुपात में काटने के बाद वो विद्युत प्रवाह के रूप में हमको मिलता है। ये ही विधि है, वो धार स्वयं में स्थिति है, वो गति नहीं है। ना आवेश है, उसमें दो विषम चीज़ माने छोटा-बड़ा, आमने-सामने चुम्बकीय वस्तु को रखने से छोटा वस्तु, बड़े वस्तु की ओर दौड़ जाता है। उसका नाम है धनाकर्षण। वो आकर्षण बल ही धनाकर्षण के रूप में परिवर्तित हो कर किसी के पास योग को प्राप्त कर लिया। दूसरे वस्तु ऋणाकर्षण में था, वो अपने जगह में स्थिर था, वो स्थिर वस्तु के पास दौड़ा हुआ वस्तु जा करके संयोग को प्राप्त कर लेता है। ये चीज़ को आप हम देखते ही हैं। इसको अच्छी तरह से समझने की ज़रूरत है। इसमें धनाकर्षण, ऋणाकर्षण कोई आवेश नहीं है। धनाकर्षण, ऋणाकर्षण की धार है वो, चुम्बकीय धार के आधार पर है इसमें।

प्रश्न :क्या कह सकते हैं, जो छोटा है, बड़े वाले की तरफ आकर्षित हो जाता है। ये आकर्षित हो जाने के आधार पर हम जिसके तरफ आकर्षित होता है, उसको ऋण में कहते हैं, जो आकर्षित हो जाता है, उसको धन में कहते हैं।

उत्तर : ठीक हैं ना, वो ही मैं भी कह रहा हूँ, आपके कहने में मेरे कहने में कोई अंतर नहीं है। जो स्थिर रहता है, ऋण में रहता है, जो दौड़ के आता है, वो धन में रहता है। ऐसा मैं कहा हूँ, ये ही चीज़ आप कह रहे हो। एक दूसरे के साथ सहअस्तित्व में ही पूरा का पूरा उत्सवित होता है, सहअस्तित्व में सभी उत्सवित होतें हैं। बात यहाँ है ये। वो जो प्रदर्शन है, वो भी सहअस्तित्व का ही प्रदर्शन है, सजातीय सहअस्तित्व का। उसमें भी लघु गुरू का बात है ही। किंतु चुम्बकीय दो पत्थर का जो relation है, वो चीज़ सजातीयता के आधार पर ये आचरण को हम देखते हैं। जबकि धरती के साथ कैसा है? सभी जात धरती में है ही है, कोई ना कोई जात ऊपर है, वो जात नीचे आता है। इसको कैसा व्याख्या करोगे? क्या धरती से वस्तु तक की चुम्बकीय धार बनी है? इसको आपसे पूछा जाए, उसको प्रमाणित करने

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