5. वास्तुशास्त्र, ऊर्जा, चुम्बकीय बल

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प्रश्न : वास्तुशास्त्र क्या है?

उत्तर : प्राचीन समय में जो सोचे है, वास्तुशास्त्र मैं समझता हूँ, गुरुकुल परंपरा जब से शुरू हुई, तब से वास्तुशास्त्र को विद्यालयों में एक अच्छे ढंग से पढ़ाने की व्यवस्था रही। उसके पहले शिल्प नाम की बात थी, शिल्पशास्त्र। शिल्पशास्त्र के बाद वास्तुशास्त्र आया। तो जो शिल्प का मतलब ये माने थे, व्याख्या दिए थे, परिभाषा दिए थे, कहीं ना कहीं, कोई जगह में गढ़ना, उभारना। जैसा- मिट्टी से कोई चीज़ को उभारा भी जाता है, गढ़ा भी जाता है। माने एक समतल से ज्यादा ऊपर आने वाली चीज़ को, उभारना कहते हैं, तो समतल से नीचे जाने वाली चीज़ को, गढ़ना कहते हैं। ठीक है, ये दोनों का, इस concept को शिल्पशास्त्र के युग में बहुत अच्छे ढ़ंग से, लोगों को हृदयंगम कराया। ठीक है। अब उस समय में भी घर बनाते रहे, और भी बड़े-बड़े इमारतों को बनाते रहे, स्मारक को बनाते रहे, ये सब होता ही रहा।

और उसके बाद आया वास्तुशास्त्र। वास्तुशास्त्र में क्या समावेश किया भाई? वास्तुशास्त्र मे ये समावेश किया- हवा, पानी, उजेला, इसका तो ध्यान रखा ही है, और स्वास्थ्य को ज्यादा ध्यान रखा। वास्तुशास्त्र में मनुष्य का स्वास्थ्य और निवास के साथ जोड़ है। एक बहुत अच्छी जोड़ है। वही चीज़ मंदिरों में क्या जोड़ है? मंदिरों में ये है, जो जहाँ प्रधान कक्ष होती है, उस कक्ष अत्यंत सुरक्षित होना, ठंडी, गरमी की ऋतुओं में बहुत ही सुखद परिस्थिति बना रहना। उसको वहाँ ऐसा, सोचा गया। अब रह गया, इसके साथ दिशा जुड़ी। दिशाओं में ये माना जाता है, मंदिर का दिशा, मंदिर का जो कपाट होता है, वो जो निकलने की जगह है, वो द्वार है ये किस ओर होना चाहिए? किस ओर नहीं होना चाहिए? ये सभी बात सोचा जाता है।

दिशा के बारे में अभी तक की जो अवधारणा है, पूर्व के ओर, उत्तर के ओर, द्वार होने की बात ज्यादा सोचा है। जो मंदिरों में जो बात आई, वो भी उपासना के आधार पर आई। उपासना दो भाग में, दो पाट में फट गई, एक दक्षिणाचार विधि हुई, एक वामाचार विधि हुई। अब क्या करें? तो इसका यही है, काँग्रेस और भाजपा की अर्थ रहा ये दक्षिणाचार, वामाचार। ये कहें पूर्व के ओर द्वार होना चाहिए, वो कहते हैं, नहीं भाई वो पश्चिम की ओर होना चाहिए। ये कहे, उत्तर की ओर होना चाहिए, वो कहते हैं दक्षिण की ओर होना चाहिए। अब क्या किया जाए? इस प्रकार के तर्क बहुत हो गई है। इसके बावजूद अपन इस जगह में समीक्षित कर सकते हैं, तो जिस अर्थ के लिए स्मारक बनता है, वो स्मारक का अर्थ सुरक्षित रहे, ज्यादा दिन, ज्यादा टिकाऊ हो सके और लोगों को सुविधा पूर्वक आवागमन बना रहे।

ये इस ढंग की स्मारक के बारे में सोचने की बात एक ध्रुविकरण होगा। उसके बाद ये भी आया, जो बहुत सारी शिल्प कलाएँ उसमें स्थापित हुई, स्थापित होने के बाद वो कम से कम क्षरण हो, ये भी उसके साथ निहित हुई। क्षरण विधि को रोकने का भी वास्तु में ध्यान दिया गया। कम से कम क्षरण हो, ज्यादा से ज्यादा दिन तक टिकाऊ रह सके, ये भी

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