22. टिकाऊ खेती
👉 विडिओ संदर्भ देखें: video 15, time 30:51-55:06
संकर जीवों के बारे में बहुत ज्यादा व्यापार फंसा या नहीं फंसा हम नहीं जानते हैं, किन्तु संकर बीज तो बिल्कुल व्यापार के चुंगल में,नाखून में पकड़ में आ गई।संकर बीजों को करने में जो सफलता मिली है, इससे क्या हो गया?देश की धरती की, किसानों के पास जितने भी बीज थी, वो सब गायब होने लगी। हर वर्ष दो-दो सौ, एक-एक सौ प्रकार की बीज गायब होते जा रहा है। कितना? सौ-सौ, दो-दो सौ प्रकार के बीज किसानों के पास से समाप्त होता जा रहा है, पूरा देश धरती में। ये कुछ दिनों बाद किसानों के पास एक भी प्रकृति सहज बीज ही नहीं रहेगा, और उसके बाद समुद्र के उस पार से बीजा मँगवाइए, बीजा देना बंद हो गया आपका कृषि बंद हो गया। खतम हो गया। उसके बाद बचता क्या चीज़ है, सूअर बचता है मछली बचता है उसको खाइए। उसी को खाइए उसी को पालिए। उस जगह में आदमी जा रहा है।
ये कुल मिला करके मानव को व्यापार कितना अच्छे ढंग से धोखा कर सकता है, दगा कर सकता है, उसका एक बहुत अच्छी उदाहरण आ रहा है, धीरे-धीरे चलते-चलते। किसानों के दरवाजा तक तो आ चुकी है, दगाबाजी, धोखाबाजी ये किसानों के दरवाजा तक आ चुका, अब वो कितना देर में ग्रसित कर लेगा, 1 वर्ष, 2 वर्ष, 4 वर्ष, 10 वर्ष ये चल सकता है, किन्तु आ चुकी है। अच्छा इसके साथ ये भी सच्चाई है, इसको जागृत करने के लिए अपने पास सही तौर, तरीका भी अभी स्थापित नहीं हुई है। कोई सटीकता से इसमें जागृत कर सके, इसमें जागृति विधि से उनमें एक स्वावलम्बन की रास्ता मिल सके, उस प्रकार से जागृत करने का कोई तौर तरीका भी कभी स्थापित नहीं हुई है। आरोप, पत्यारोप तो चालू है, किन्तु आरोप, प्रत्यारोप से कोई फायदा नहीं है। वो सुविधा के वशीभूत हर किसान भी है, हर मजदूर भी है, हर विद्वान भी है, हर बेवकूफ भी है, हर नेता भी है, सभी कोई सुविधा के वशीभूत ही हैं।
वो सुविधा के वशीभूत होने का फलस्वरूप ये सारे बीज किसानों के हाथों से खसकती चली जा रही है। कई सैंकड़ों प्रकार की धान का किस्म हमारे देश से उठ चुकी, अब वो नहीं है। अभी कम से कम 60 वर्ष का तो हमारे पास ध्यान है, तो ये 60 वर्ष की पहले, हम जितना प्रकार की धानों को देखा था, हमारे आँखो में उसमें से कम से कम 60-70 प्रकार की तो हम जानता हूँ, वो धान अब नहीं हैं, वो अनाज अब नहीं हैं, वो बीज ही नहीं हैं। वो बीज को, कब कितने बरसों में, कितने प्रयासों में, कितने परिश्रम से आदमी प्राप्त किया था, इसको कौन आँकलित करने जाता है, इसको कौन इतिहास लिखने जाता है, कौन बताने जाता है, किसको उतना फुरसत है, किसके पास उतना साधन है जिससे कि हम ये सब कर दूँ। इस प्रकार के हम फंसे हैं, बुरी ढंग से फंसे तो हैं, इसमें 2 राय नहीं है। विज्ञान की नाम से, विज्ञान के प्रति समर्पण है,जो कुछ भी वो समर्पण के पीछे बड़ी दगाबाजी है, ये बात सच्चाई है। इसमें 2 राय नहीं। बाकि जो कितने दिन में सबका गला कटेगा या किसी एक का बचेगा सबका कटेगा, वो आगे भविष्य बताएगा, किन्तु दगाबाजी तो सही है। उसका असर होना 1 वर्ष में हो जाए, 4 वर्ष में हो जाए, 3 वर्ष में हो जाए, यदि हम चेतेंगे नहीं, इसको रोकने की अपने पास कोई माद्दा नहीं है, तब तो आहत होके ही रहेगा।