उत्तर : ये बात एक सोचने की तरीका है। कई जानवर संतान नहीं देते हैं, वो जानवर नहीं है, ऐसा नहीं कहते हैं। इसी प्रकार से मनुष्य को किसी के यदि संतान नहीं होता है, निश्चित कारणों से, वो मनुष्य नहीं हैं, ऐसा बात तो होता नहीं। पहला गुरु मंत्र तो यही है।
उसके बाद आता है, संतान का बहुत अपेक्षा है, समझ लो। संसार में बहुत सारा संतान ऐसा है, जो पाल नहीं पाते हैं, ऐसे को ला करके पाल लो। संतान आपका बना लो, खुशहाली मना लो। पहले भी दत्तक पुत्र दत्तक संतान के बारे में बात हुई है। उस विधि से अपने भाई, परिवार, किसी भी गोत्र से ला करके पाल सकते हैं। कुछ नहीं होता है तो बहुत सारा अस्पताल रखी हुए है, आवारा बच्चों को वहां रखे रहते हैं, वहां से ला ले और पाल लो। किसी से भी मन नहीं भरा तो ये क्या test tube baby program है। Test tube baby कार्यक्रम, मानवता के लिए बहुत सटीक उपयोगी तो नहीं है। उसमें भी कहीं ना कहीं प्रच्छन रूप में संकरता हो गया है मानते हैं। उसमें ये मानते हैं, नारियों में दोष नहीं रहता है, नर में ही दोष रहता है। उसको lab में देखने की व्यवस्था है, शुक्र कीट यदि जीवित कीट नहीं हैं, ऐसे जो परिवार है, उनके नारियों में कोई ना कोई विधि से इसको स्थापित करने का व्यवस्था करते है। वो भी एक संकरता की ही कार्यक्रम है। वो अवैध हो चुका है। छिपे चोरी में इस प्रकार की कार्यक्रम को करते है। उसमें बहुत पैसा पैदा करते हैं, एक आदमी का कम से कम एक-एक लाख रूपया खर्च करा देते हैं। सबसे अच्छा आलीशान वही है, यदि आपका मन भरता है, तो अपना जात,पाट,नात, गोत्र से कोई लड़के को ले लें, वो नहीं तो अस्पताल में आवारा बच्चें हर दिन मिलते हैं।
प्रश्न : अभी तो अव्यवस्था है इसलिए आवारा बच्चें मिल जाएंगे। जब व्यवस्था हो जाएगी तब तो आवारा बच्चें मिलेंगे नहीं?
उत्तर : व्यवस्था होने के उपरांत मनुष्य में ऐसा कोई अव्यवस्था का बात भी नही आता है। डिम्ब कीट अथवा शुक्र कीट विकृत होने, अथवा नहीं होने, मृत होने, इस प्रकार की जो प्रक्रिया होता है, मनुष्य की रहन सहन की कहीं ना कहीं गलतियां हैं। उसको अलग से अध्ययन किया जा सकता है, किन-किन कारणों से ये बात हो सकता है, आयुर्वेद में काफी चीजें कही गई हैं, इन लोग भी कहते होंगे,हम ऐसे ही विश्वास करता हूँ । उससे बचा जा सकता है, सही ढंग से जिया जा सकता है, इच्छा अनुसार संतान को पैदा किया जा सकता है। इच्छा नहीं तो सीमित संतान के साथ जिया जा सकता है, आवश्यकता पड़ने पर जनसंख्या को घटाया, बढ़ाया जा सकता है, ये सब आदमी की स्वतंत्रता का काम है। आदमी इस बात में स्वतंत्र है। इसमें भगवान देने की, नहीं देने की कोई परेशानी नहीं है, भगवान के पास इस प्रकार की कोई भी दफ्तर नहीं है।