व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी सहज उदय की ओर परावर्तन क्रिया ।
उत्साह :- उत्थान के लिए साहस ।
व्यवस्था सहज सजगता ।
कृतज्ञता, सौम्यता
कृतज्ञता :- जिस किसी की भी सहायता से उन्नति (विकास और जागृति) की प्राप्ति में सहायता मिली हो, उसकी स्वीकृति ।
सौम्यता :- स्वेच्छा से स्वयं का नियंत्रण ।
स्वभावगति प्रतिष्ठा अर्थात् शिष्टता ।
गौरव, सरलता
गौरव :- निर्विरोध पूर्वक अंगीकार किये गये अनुकरण ।
सरलता :- ग्रन्थि व तनाव रहित अगंहार ।
विश्वास, सौजन्यता
विश्वास :- परस्परता में निहित मूल्य निर्वाह ।
व्यवस्था की समझ, समाधान की अभिव्यक्ति और संप्रेषणा ।
सौजन्यता :- सहकारिता, सहभागिता, सहयोगिता, पूरकता ।
सत्य, धर्म
सत्य :- जो तीनों काल में एक सा भासमान, विद्यमान एवं अनुभव गम्य है।
अस्तित्व, विकास, जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक-भौतिक रचना विरचना के प्रति प्रामाणिकता का नित्य वर्तमान ।
अस्तित्व सहज स्थिति सत्य, वस्तु स्थिति सत्य, वस्तुगत सत्य नित्य वर्तमान ।
धर्म :- धारणा ही धर्म है । जिससे जिसका विलगीकरण न हो ।