नीचे वस्तु आना ऊपर से कोई चीज फेकनें के लिए हम कोई बल को लगाते हैं, वो बल किसी ना किसी दूर में जाकर शून्य हो जाता है। शून्य होने के बाद उतने ही बल को पुनः जहाँ से फेके थे,वहाँ आ करके उतना ही बल को पुनः प्रदर्शित कर देता है। ये स्वाभाविक क्रिया है। वियोग के लिए जो बल मिली, सहयोग के लिए उतना ही बल मिली। हरि हर। जय हो, मंगल हो, कल्याण हो।
धरती से वियोग के लिए जितना बल प्रयोग किया, उतना ही बल पुनः उपार्जित कर वो वस्तु प्रदर्शित करके संयोग के लिए बल प्रदर्शन कर दिया। इस ढंग की ये विन्यास है, इन विन्यासों को यदि हम अपने मनगढ़ंत बरबादी के लिए व्याख्यायित करते हैं, हम क्या हैं - कितना विज्ञानी, ज्ञानी, क्या है आप ही सोच लीजिए। मूल्याकंन करिए, संसार को मार्गदर्शन करिए। संसार को सही पथ को प्रदर्शित कराईए। यही बनता है। सभी अच्छे व्यक्ति के साथ तो इतना ही बनता है। तो इसी क्रम में ये कार्यक्रम है। ये तो हुआ भार का बात। भार के बाद क्या होता है मूलतः भार का दो सूत्र लगती है इसमें। प्रत्येक इकाई में चुम्बकीय बल सम्पन्नता है ही। ये परस्परता में चुम्बकीय धारा बनती है। आकर्षण, ऋणाकर्षण, और धनाकर्षण में ये प्रदर्शन होता है। धनाकर्षण में प्रदर्शन करता है जो भाग, उसमें भार प्रदर्शन आ जाता है। ऋणाकर्षण में जो अपना स्थिति को प्रदर्शित करता है, उसमें भार प्रदर्शित होता नहीं है। उसका भार प्रदर्शन के लिए उसका कोई होना चाहिए ऋणाकर्षण वाला, ये धनाकर्षण के स्थिति में होना चाहिए, तब जा करके वो अपना भार को प्रदर्शित कर देता है। दूसरे विधि से ऐसा सोचा जा सकता है।
तो इसमें ये देखा गया, जो अभी एक बहुत अच्छी बात कहें थे, विरल पदार्थ के रूप में धरती के अंदर दो हज़ार feet नीचे से प्राकृतिक gas ऊपर जाता हुआ हम देखते ही हैं, सुनते ही हैं, ये सारा बात हो ही रहा है स्वाभाविक रूप में। ऊपर जाते हुए भी प्राकृतिक गैस में भार नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। भार रहता ही है। गुरुत्वाकर्षण की बात ना हो करके सहअस्तित्व विधि से ही व्याख्यायित होता है ये। हाँ अनुबंधन के रूप में ही ये बात है तो अनुबंधन की विधि दूसरा प्रकार से हम बताएंगे। एक बात तो हो गया सहअस्तित्व विधि से ठोस ठोस के साथ, विरल विरल के साथ, तरल तरल के साथ, अपने वैभव को प्रदर्शित करने के लिए दौड़ते हैं। आप कोई बल लगाइये चाहे ना लगाइये। बात पूरा हो गया सहअस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए जो दौड़ता है, उसी गति को हम अवरोध करने पर वो भार में हमको मिल जाता है, भार के गणना में मिलता है। दौड़ने वाला वस्तु को हम कहीं भी रोक लेते हैं, वो भार प्रदर्शन वहाँ होता है।