उत्तर : ये धरती के वातावरण के अंदर घटित होता है।
प्रश्न : मतलब धरती के वातावरण के बाहर से कोई चीज नहीं गिरता है?
उत्तर : बाहर से कोई चीज नहीं आता है। निःसोच बैठे रहो।
प्रश्न : इतने बड़े-बड़े पत्थर धरती पर गिरते हैं ?
उत्तर : वो सब इसी धरती की वातावरण की है। आप सोचो, इस धरती से समृद्ध वातावरण कहाँ होगा?
प्रश्न : उन पत्थरों का अध्ययन करने से पता चला है कि जो उसका material है, वो धरती में मिलने वाले material से भिन्न है?
उत्तर : अभी चन्द्रमा से लाए material, धरती में जो material है, किसी material के तुल्य ही है। अरे व्यर्थ की ये सब बातें ले करके दिमाग पचाना हो तो पचा सकते हैं।
प्रश्न : हम लोग ऐसा अभी तक सुनते हैं यदि किसी जगह में यदि गर्मी हो जाए, वहां से हवा के कण दूर हट जाते हैं, आप इससे विपरीत बता रहे हैं, कि कहीं यदि तापमान हो जाए तो दूर-दूर से कण वहाँ पर आ जाते हैं?
उत्तर : हाँ, वो चुम्बकीय बल के संयोग से बता रहा हूँ, वो छूट गया ना, उसको जोड़ लीजिए, वो पूरा हो जाता है। वो धरती को छूते तक वो इकट्ठा करते ही आता है, पिण्ड बन जाता है।
प्रश्न : जबकि जो विज्ञान की अवधारणा है वो इसके उलटा है, कि वो मोटा आता है, और हवा से टूट-टूट करके छोटा रह जाता है?
उत्तर : ठीक है भाई, कहने में हम क्या कर डालें हम, कहे हैं। होता है इतना ही है।
प्रश्न : ये जो ब्रह्मांडीय किरणें हैं, इतनी आवेशित हो जाती हैं, गर्म हो जाती हैं?
उत्तर : किसी एक प्रकार की अणु का संयोग होने से, ये तो आप जानते हो, कोई भी दो प्रकार की आवेश, एकत्रित होने से तीसरे प्रकार की आवेश में परिवर्तित होता है। ठीक है? कोई भी दो प्रकार की आवेश एकत्रित होने से तीसरे प्रकार की आवेश में परिवर्तित ,परिणत हो जाता है। ये समझ में आता है? उसी विधि है इसमें भी। इसमें क्या हो जाता है, जो ब्रह्मांडीय किरण आ करके, किरण का संयोग में, किसी निश्चित प्रजाति की अणु मिलना चाहिए, उसमें योग होना चाहिए। योग होते ही उसमें एक ताप का प्रचण्ड ताकत बनता है। वो ताप से, आकर्षण बल दूर-दूर तक, आकर्षण का field जो बनता है वो दूर तक बन जाता है। बनते ही, उसी के साथ-साथ जलता-जलता हुआ नीचे आता है। आते आते उस मार्ग में जीतने भी आस-पास के हैं सबको बटोर के धरती में आ के बैठता है।
प्रश्न : ब्रह्मांडीय किरण का मतलब आवेषित कण?