प्रकाश। जो परार्वतन में आ रही है, वो ताप है। पहले प्रतिबिम्ब आता है, बाद में ताप आता है। ताप की गति कम है, प्रतिबिम्ब पड़ा ही रहता है। जैसे ये (bulb) जलने के पहले भी इसका प्रतिबिम्ब रहा। क्या बात है - क्या हालत है ,हालत कहाँ पहुँचा?
इस ढंग से प्रकाश और ताप दोनों अलग अलग विन्यास है। बिम्ब का प्रतिबिम्ब एक प्रकाश है। बिम्ब में निहित उष्मा का परार्वतन हमको मिलना वो ताप है। वो ताप जो प्रतिबिम्ब के साथ आता है, उसका नाम है किरण। ताप जो प्रतिबिम्ब के साथ इस धरती के ऊपरी सतह में आ कर छूता है, उसका नाम है किरण। उसके साथ प्रतिबिम्ब रहता है बताया, वो प्रतिबिम्ब का अनुबिम्ब, प्रत्यानुबिम्ब होना पाया जाता है।अनुबिम्ब का मतलब है, जो प्रतिबिम्ब पड़ा है वो कई direction में जो molecules रहते हैं, उसके ऊपर जा करके आबंटित होना और उसके बाद वो पुनः आबंटित होना ये प्रक्रिया धरती के सतह में आने तक, अनुबिम्ब, प्रत्यानुबिम्ब विधि से बंटता रहता है। उसी अनुपात में ताप भी आबंटित होता हुआ आता है। आते आते धरती को जब छूता है प्रतिबिम्ब, उसका नाम है रश्मि। क्या बात है! ये बहुत छोटा सा काम! आगे चल करके प्रकाश विधि इसी आधारों पर, इसी सूत्रों पर, इसी बुनियाद पर प्रकाश व्याख्यायित हो जाता है।
ताप परावर्तित होने के लिए दौड़ता है। परावर्तन का मतलब है, ताप घटने की आशय से ताप बहता है। ताप के रूप में जो एक स्वरूप रहता है कहीं भी, ताप का मापदंड के रूप में हम कहते हैं - 200°, 400°, 1,000°, 2,000° - ये सब कहते हैं ना? किसी ना किसी degree में ये धरती के अंतिम छोर में छूआ है, वहाँ से वो ताप क्या करना चाहता है? कम होना चाहता है, कम होने के लिए यहाँ वातावरण बना हुआ है। बनी हुई वातावरण को हमने क्या कर दिया? छेद काट दिया - ये विज्ञान है।