प्रश्न : ये बटते कैसे हैं?
उत्तर : बटते इस प्रकार से हैं, ऊपर से जब उतना ही आ गई ताप, ताप क्यों आता है? कम ताप जहाँ है, वहाँ खतम होने के लिए आता है। कम ताप की ओर ज्यादा ताप दौड़ता है। ज्यादा ताप जब दौड़ा, कम तप्त था धरती की छोर, वहाँ वो ताप छूआ।
प्रश्न : ताप छुआ मतलब ऐसा लगता है कि इस कण से कोई चीज़ निकलकरके उस कण में पहुँच गया, ऐसा होता है क्या?
उत्तर : सूर्य के अंतिम छोर में जो कणों के पास जितना ताप था, जितने degree की ताप था, वोही degree की ताप धरती के अंतिम छोर की कणों के साथ जुड़ा।
प्रश्न : ये जुड़ा कैसे कुछ चीज़ आया वहाँ से, चलकर कोई कण आया?
उत्तर : परावर्तन, कणों से कणों तक पहुँचने को परावर्तन कहते हैं।
प्रश्न : एक कण से दूसरे कण तक क्या कुछ चीज़ निकल के पहुँचता है या भौतिक वस्तु का आदान, प्रदान नहीं है?
उत्तर : आदान, प्रदान कुछ नहीं, वो ताप जो दौड़ता है, यहाँ वस्तु है, वहाँ वस्तु है, इन दोनों के बीच में space है, इसको गरम कर दें वो गर्मी वहाँ भी है।
प्रश्न : क्यों हो जा रहा है ये गरम?
उत्तर : इसमे कोई खाने वाला नहीं है, इसमें घटाने वाला बढ़ाने वाला नहीं है बीच में।
प्रश्न : गर्मी इसको किये हैं वो कैसे हो जा रहा है गरम?
उत्तर : इसीलिए होता है, इसके - इसके ससम्मुखता है। इसके सामने ये है, इसलिए होता है।
प्रश्न : अपने आप जैसे आप को भी बहुत ज्यादा प्रसन्नता होगी तो मैं प्रसन्न हो जाऊंगा इसी type का?
उत्तर : इसी विधि से शोक संताप भी है, ये सभी चीज़ ऐसे ही है। बहुत आसान कार्यक्रम है ये, सहज कार्य है ये।
प्रश्न : मतलब बाबा एक इकाई आवेषित हो गई है, उसके आवेश को सामान्य बनाने के लिए बाकी सब तुले हैं, उसके बाजू का जो कोई भी कण है, वो अपने आप में कुछ आवेश को स्वयं में स्वीकार लेता है, उसका आवेश कम हो जाता है। यही सहस्तित्वादी विधि है?
उत्तर : यही सहअस्तित्व का प्रमाण है, इसी विधि से हर आवेश सामान्य होने की सिद्धान्त निकलती है। नहीं तो आवेश सामान्य ही ना हो।