प्रश्न : प्रचलित चिकित्सा विज्ञान काफ़ी हद तक शारीरगत समस्याओं का निराकरण कर चुका है। इस संदर्भ में मध्यस्थ दर्शन कहाँ fit बैठता है?

उत्तर : शरीर शरीर ही है, जीवन जीवन ही है, अस्तित्व अस्तिव ही है। ये तीन मुद्दा समझ में आता है? इस तीनों के बीच में है - विकास क्रम, विकास, जागृति क्रम,जागृति। कितना मुद्दा हुआ?अस्तित्व है ही, उसको आप नहीं बनाओगे, मैं नहीं बनाऊँगा, हमारा दर्शन नहीं बनाएगा। दर्शन वोही है जो है, उसका हम दर्शन किया है। जो नहीं है, उसका हमने दर्शन नहीं किया है। ठीक हो गया? जो नहीं है उसको आपका दर्शन बताता है, भौतिक दर्शन। ठीक है? आप बोलते हो नहीं था, उसको हम करते हैं। हम कहते हैं - जो थी, उसी को हम करते हैं। दोनों में अंतर इतने ही है। नहीं है, उसको आप कर ही नहीं सकते। ना हम कर सकते हैं। कितना एक ताल ठोको कार्यक्रम है ये? सोचने की बात है कि नहीं है? तो इसमें जो है आगे चल करके आपको जब जरुरत होगी, तब हम सोचेंगे। अभी जहाँ तक शरीर ज्ञान के बारे में हमारा सहमति यही है, अभी तक, शरीर को विज्ञानी भी काफी अच्छी ढंग से समझे। इसमें कोई शंका नहीं। इसके पहले, विज्ञान के पहले जो आयुर्वेदविद्, जो शरीर को समझे थे, उससे भी सुस्पष्ट रूप में कई चीज़ को समझे हैं।

इसमें हमारा सहमति है। ठीक है? जहाँ तक machine से और समझ में आता है, वो सभी चीज़ समझे हैं। ठीक है? Machine से जो समझ में नहीं आता है, उसको ये समझते नहीं हैं। ठीक बात हो गई? दूसरा बात ये है रोग के बारे मे ये बात है ये जो हम जो विश्लेषण करते है ,संश्लेषण करते हैं उसमें जो शरीर गत जो मैंने कोषाएं हैं उससे भिन्न जो मिलते कोषाएं मिलते है उसको आक्रामक संक्रामक कोषाएं मानते हैं उसको उन के भाषा में कहते हैं virus हर रोग का कोई virus होता है उसमें वो विश्वास रखते हैं। antibiotic का क्या मतलब होता है? प्राणकोशाओं का विरोधी, यही बनता है। उसके लिए हिन्दीकरण किया है प्राण रक्षक। ये अच्छे आदमियों का काम है कि नहीं है। मैं आपको एक sense बताया एक शब्द की तर्जुमा की बात किया। हम कितने अच्छे आदमी हैं? उसको प्राणरक्षक दवाई प्रयोग किया है, हिन्दी में। उसमे लिखे हैं प्राण नाशक दवाई, वो लिखा है, उसमे लिखा है जो, antibiotic का जो sense होता है, प्राणनाशक दवाई है। हम क्या कहते हैं प्राणरक्षक दवाई। दोनों कितना समीचीन है रे सोच लो, हम कितने अच्छे आदमी हैं? एक बात आपको इंगित करना चाहा।

इनके प्रयोंगों में देखी गई कि जो बैक्टीरिया मिलती है उसके उपर जो दवाइयाँ डालते हैं जिससे वो मर जाता है, उसको उस रोग के लिए recommend करते हैं। साथ में ये लिखे रहते हैं इसको ज़्यादा प्रयोग नहीं करना ज़्यादा प्रयोग करने से बहुत हानि पहुँचाता है। यह भी लिखे रहते हैं। होता क्या है,क्रिया क्या होता है भई ?ये जो प्राणनाशक कीट रहता है, माने जो स्वस्थ प्राणकोशाओं को हलाकान करने वाले सूत्र रहते हैं, एक को मारते तक में हज़ार स्वस्थ कोशाओं को भी मारा रहते है ये ही antibiotic। इसका प्रमाण कैसे मिलता है भाई, इसको हमने देखा- निमोनिया और दूसरा क्या है वो? Typhoid नाम का एक ज्वर होता है जिस में आंतो में ज्वर होता है, उसमे आंतों में छोटी-छोटी छाली हो जाती हैं उसके बाद ज्वर पैदा होता है वो दीर्घकालीन, ज़्यादा दिन रहने वाली ज्वर मानते हैं। उसके लिए अलग चिकित्साएँ लिखी हुई हैं। उसके लिए antibiotic प्रयोग किया जाता है। प्रयोग करने के बाद वो आदमी जो एक प्रकार से अधमरा जैसा ही होता है। ठीक हो गए? ये देखा गया। उसको हम आयुर्वेद औषधियों से भी चिकित्सा देते हैं। ठीक है? जबकि रोग का तो कहीं ना कहीं एकदम स्वस्थ जैसा तो होता नहीं है, किन्तु उससे बहुत

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