संकरता जो है, उन्नत बीज विधि भी, ये संकर विधि है, बीज में उन्नत बीज प्रक्रिया होता है। “बीज गुणन प्रक्रिया” बीजों में बहुत ज्यादा गुण परिवर्तन करने वाली प्रक्रिया है, वो भी एक संकरता ही है। जैसा टोमेटो को तैयार किया गया, संकर विधि तो है ही ये।

संकर विधि के लिए आपको बताया, इसमें जो रस होता है, प्राकृतिक रूप में सप्तधातुओं के रुप में परिणत होने के लिए प्रकृति जो प्रयुक्त किया है, जिसमें मानव शरीर रचना में, सातों धातुओं का, चौबीस प्रकार की रसों का जो नियोजन किया है, इन चौबीस प्रकार की रसों का जो एक प्राकृतिक स्वरूप, ये सप्त धातुओं को प्रमाणित करने में सार्थक रहे हैं। जिससे ये मानव का शरीर रचना, जो जीवन अपने जागृति को प्रमाणित करने योग्य बनाने में सार्थक रहा, अभी हम कुछ भी इसमें विकृति करते हैं, ये जागृति के लिए योग्य रहगा, नहीं रहेगा आगे अपन सोचने की बात है।और मानव के साथ भी कुछ ऐसे खिलवाड़ करने के बारे में जा रहे हैं।कल वो संकेत ठाकुर बात रहा था। कल ये स्पष्ट होगा,मानव जो है, वास्तविक, प्राकृतिक मानव के रूप में रहेगा या नहीं रहेगा।

अभी भी प्राकृतिक रूप में मानव, पशु मानव, राक्षस मानव के पद से बहुत ज्यादा विकसित तो हुआ नहीं है। अभी मानव, देवमानव, दिव्य मानव के रूप में विकसित होना, जागृत होना ही बाकी है, उसी के पहले ये पशु मानव, राक्षस मानव को ही और विकृत करने के लिए यदि कोशिश करते हैं, हम और पीछे जाने वाली बातें हो सकती हैं, आगे जाने वाली बात तो हो नहीं सकती।ये बात हम कहना चाहते है। इसमें हमारे अनुमान ऐसा है, संकर प्रकार से जितने भी बीज के बारे में सोचते हैं, या जीव जानवरों के बारे में सोचते हैं, इससे मानव को हानिप्रद स्थिति ही बनेगी, इससे मानव का कोई सहायता होगा नहीं। मानव मानसकिता के लिए, मानव स्वास्थ के लिए, मानव व्यवहार के लिए, मानव का सोच विचार, कार्य प्रणाली के लिए, ये कोई सहायक होने वाला नहीं, और भी हानि ही होगी। अभी पूरा मानव परंपरा जागृति के पद में पहुँचा ही नहीं है, उसी के पहले और अँगुली करना शुरू कर दिया।ये स्थिति आ गयी।

प्रश्न : वर्तमान परिपेक्ष में टिकाऊ खेती का स्वरूप क्या होगा?

उत्तर : वर्तमान परिपेक्ष में टिकाऊ खेती का आज का फॉर्मेट यही है, चौखट यही है, घर में कास्तकार के पास गौशाला हो, पहला कन्डिशन, दूसरा कोई विधि से कास्तकार टिक नहीं पाएगा। तो सर्वप्रथम गौ पालन, गौ पालन से 2 प्रकार की फायदा, घर में घी, दूध, मट्ठा, दही ये पूरा हो जाता है, दूसरा भाग गोबर, गौमूत्र से गोबर गैस पैदा करना, उससे इंधन व्यवस्था, चूल्हा-चौकी पूरा हो गया, तीसरा उससे कॉम्पोस्ट खाद तैयार करना, कॉम्पोस्ट खाद तैयार करके खेती को उर्वरक बनाना। जिसको छोड़ करके दूसरे विधि से, कोई विधि से किसान बचने वाला नहीं है, उजडेगा ही उजडेगा। दूसरा, सामान्य रूप में हर जगह में जो देशी बीजा है, उसको सुरक्षा करना। ये उन्नत बीजा के प्रति अपना विश्वाश को सर्वथा हटाना। लवलेश भी उस ओर नहीं जाना। तभी किसान अपने घर में अपना दाना-पानी खा करके अपने बच्चों को स्वस्थ देख पाएगा, नहीं तो बारह बाट होने ही वाला है। जो अभी तीन बाट हुआ होगा तो, चौदह बाट होगा ही। ये आने वाल ही दिन है ये, ये कहीं दूर नहीं है, ये पास आ चुकी है। तो इसका साधारण format यही है। इसी चौखट में यदि जी पाता है आदमी, किसान, वो किसानी सही है, वो परंपरा सही है। उनको

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