आकर्षण में रहता हूँ मैं स्वयं, यदि जब हम तृप्त होने लगते हैं, तब प्रत्याकर्षण में परिवर्तित हो जाते हैं। प्रत्याकर्षण का मतलब वो सारे-सारे वस्तु हमारा बुद्धि में निहित हो जाता है। इसका मतलब होता है, वस्तु का स्वभाव, धर्म, प्रयोजन निहित हो जाना। ये समझ है, ये जब तक नहीं होता है, तब तक हम समझे कहाँ हैं। शब्दों के साथ समझ का प्रमाण होता नहीं, वार्तालाप हो सकता है, चर्चा हो सकता है, घटना के साथ अपना किया हुआ चर्चा का एक सांत्वना लगाने वाली काम होता है, प्रमाण तो होगा नहीं। अभी आज सवेरे जो आपके साथ जो शुरुवात हुई थी मिश्रा जी बात जो सवेरे की बात थी।
तृप्ति को पाने का जो संकेत है, वो कंपन है, मनुष्य में क्या कहोगे उसको? “उत्सव”। वो तृप्त बिन्दु स्वयं मे एक कंपन की अवस्था है। किसकी?जो बोध और प्रमाण के बीच की एक कंपन वस्तु है, जो आत्मा में ही होता है, नित्य वस्तु है, निरंतर वो बना ही रहता है। एक बार वो तृप्ति बिन्दु मिलती है, वो तृप्ति निरंतर आवंटित होने के लिए तैयार बैठा ही रहता है। इस ढंग से अक्षय बल का वैभव उसमें तैयार होता है, जीवन में। जीवन के अनुभव के क्षणों में, अनुभव के क्रिया में, निरंतर ये उत्सव बना रहता है।
तो इसमें क्या हुई आकर्षण, प्रत्याकर्षण दोनों का तृप्ति बिन्दु मिल गया, तब वो कंपन हुआ। वो कंपन के against में वो परमाणु में क्या हो गयी? स्वभाव, गति आई। अपने में क्या चीज़ है? वो प्रमाणित हो गया, इसका तृप्ति मिल गई, इस ढंग से आकर्षण, प्रत्याकर्षण के योगफल में कंपनात्मक गति होती है। यही कई जगह में अपना हर रोजमर्रा में अनेकानेक जगहों में इसको पहचाना जा सकता है।
प्रश्न : प्रत्याकर्षण और आकर्षण से वर्तुलात्मक गति है?
उत्तर : अब जड़ प्रकृति की बात हो गई और मनुष्य के कार्य प्रकृति की बात हो गई। तो किसी वस्तु के साथ हम आकर्षित होते हैं। जिसके ओर आकर्षित रहते हैं, वो प्रत्याकर्षित रहता है, उसका प्रतिक्षा किए रहता है वो आकर्षण। जो वस्तु जाता है, उसका प्रतीक्षा, आगे की आकर्षण उसका प्रतिक्षा किया रहता है, इसका नाम है प्रत्याकर्षण। जैसा यहाँ हम आए, यहाँ प्रतिक्षा बनी ही रही।
प्रश्न : हम लोगों में आपके प्रति प्रत्याकर्षण है?
उत्तर : प्रत्याकर्षण बनी रही, आकर्षण हमारे में बनी रही।
प्रश्न : आप में आकर्षण हम में प्रत्याकर्षण?
उत्तर : हाँ, ये दोनों मिलकरके पुनः गति बन गई। क्या गति बन गई? कार्य गति बन गई, कार्य गति के अंतर्गत अभी अपन गुजर रहे हैं। ये जितने भी विचार से लेकर, कार्य से लेकर, अभिव्यक्ति से लेकर, प्रमाण से लेकर, जितने भी कार्य हम कर रहे हैं इस समय में, वो सब कार्य गति ही है।
प्रश्न :बाबाजी ये सूत्र जड़ वस्तुओं के लिए है या चैतन्य के लिए?