सब शरीर की सारे फोर्स लगता है, उसको जल्दी ठीक करो, जैसा हड्डी टूट गया, तो उसको जोड़ने के लिए पूरा ताकत लग जाता है। ये क्या चीज़ है? ये कंपनात्मक गति, वर्तुलात्मक गति के योगफल में जो स्पंदन बनता है, उसका ये सब प्रदर्शन है, प्रमाण है। इस ढंग से हम हर जगह में प्रवृत्ति को, कंपनात्मक गति के फलस्वरूप वर्तुलात्मक गति को, वर्तुलात्मक गति के फलस्वरूप हम कंपनात्मक गति को पाकर हर कार्य संपादन करते हैं।
जड़ परमाणुओं में परिणाम शीलता भी है, श्रम शीलता भी है और गतिशीलता भी है। परिणाम शीलता, गति के लिए, गति पुनः परिणाम के लिए एक दूसरे की प्रेरक होने की विधि बताया।
प्रश्न :दोनों गतियाँ एक साथ रहेंगी? एक दूसरे के पूरक के रूप में?
उत्तर : हाँ, इसके मूल में unit के रूप में क्रिया, एक वस्तु में उसका पूरा Quanta यदि पहचानना है, क्रिया है, क्रिया सहित ही एक क्वांटा है। क्रिया को अलग करके कोई Quanta आपको मिलने वाला नहीं है। ये सोचना निष्क्रिय क्वांटा कोई चीज़ होता है, वो होता ही नहीं है। यही आदमी भ्रमित होने की बात है, तो मूलतः कोई भी मात्रा यदि हम पहचानना है, वो गति सहित ही है, माने क्रिया सहित ही है। क्रिया का व्याख्या श्रम, गति, परिणाम है, जड़ संसार में। और चैतन्य संसार में क्या है, भ्रम और जागृति ही है, और कुछ भी नहीं है। जड़ संसार में, रासायनिक भौतिक संसार में, क्रिया का व्याख्या श्रम, गति, परिणाम ही है,और कुछ चौथे प्रकार की चीज़ होता ही नहीं है। चैतन्य संसार में जो है भ्रम और जागृति ही है, और कुछ होता ही नहीं है। इतने में तो सारा फैसला है। इस अनन्त संसार का फैसला इतने ही essence में बैठा हुआ है।