उत्तर : अभी हम मनुष्य के लिए इसको बताया, आप हमारे बीच में इसको बताया, वोही चीज़ एक जड़ परमाणु में है। ये सूत्र है, ये सूत्र को व्याख्या जीवन करता है, परमाणु करता है, अणु करता है, अणु रचित पिण्ड करता है, धरती करता है, धरती की हर जर्रा करती है। व्याख्यायित किया ही रहता है। मूलतः जो मूल बल है, सत्ता है। सत्ता आपमें, मुझमें परमाणु में सब में पारगामी होने के कारण से मूलतः जो है ना, मूल ताकत है, वो सत्ता है। सत्ता में हर वस्तु बल सम्पन्न होने के आधार पर कार्यशील होने के लिए प्रवृत्ति है। कार्यशील करता कैसा हो जाता है भाई ? उसमें आकर्षण, प्रत्याकर्षण का योग होना आवश्यक है। जैसा श्रम और गति का आकर्षण, प्रत्याकर्षण होने पर एक कार्य की स्वरूप बनता है। गति और परिणाम का योगफल होने से, आकर्षण, प्रत्याकर्षण होने से कार्य गति का स्वरूप दूसरा होता है। इस विधि से श्रम, गति परिणाम क्रिया का अभिव्यक्ति है, व्याख्या है। क्रिया है उसका मतलब ही है श्रम, गति परिणाम। तो सदा-सदा श्रम, गति, परिणाम से सम्पन्न प्रत्येक परमाणु उत्सावित होने की विधि आकर्षण, प्रत्याकर्षण के योगफल में होते ही रहता है। निरंतर होता रहता है।
इसमें दो इकाई नहीं हैं, एक ही इकाई की एक अंग दूसरा अवयव के साथ। जैसा आप ही बैठे हो, आपका आँख के साथ नाक, नाक के साथ हाथ, ये एक दूसरे के साथ आकर्षित, प्रत्याकर्षित होने पर कार्य होगा की नही होगा? शरीर आपका एक ही है। उसी भांति परमाणु एक ही है। परमाणु में ही श्रम गति, परिणाम ये तीनों का तीनों सदा-सदा क्रिया का व्याख्या के रूप में अभिव्यक्त है। नित्य अभिव्यक्त है, नित्य प्रकाशमान है, ये कहीं रूकते ही नहीं हैं। इसको कहीं रुका हुआ जगह को आप हम सारा संसार लग जाओ तो भी नहीं मिलेगा। निरंतर ये रहता ही है। क्या चीज़- विकासशील परमाणुओं में श्रम, गति, परिणाम । इसमें कम से कम दो की योगफल में, आकर्षण, प्रत्याकर्षण, फलस्वरूप दो कंपनात्मक गति, वर्तुलात्मक गति बना ही रहता है।
ये कंपनात्मक गति की बात हुआ। काहे के लिए कंपनात्मक गति? कार्य में व्यक्त होने के लिए, दूसरा वर्तुलात्मक गति की बात, जो आकर्षण, प्रत्याकर्षण के योगफल में कम्पनात्मक गति, प्रत्याकर्षण और आकर्षण के योगफल में वर्तुलात्मक गति ये लिखा हुआ है। वर्तुलात्मक गति होने के लिए जो आकर्षण, प्रत्याकर्षण हुआ, उससे जो कंपन बना, उसका प्रयोजन के रूप में जो गति बनता है, उसका नाम है, वर्तुलात्मक गति। इस ढंग से कंपनात्मक गति, वर्तुलात्मक गति के संबंध को आपको बताया। एक परस्परता में गति की बात, परस्परता नहीं है तो कोई गति की बात ही नहीं है। शून्य में कोई गति की बात ही नहीं है, शून्य कोई गति ही नहीं है, ना तरंग है।
एक इकाई में अंग, प्रत्यंगों के परस्परता में गति की बात कर रहे हैं। परमाणु के एक अंश, दूसरा अंश इन दोनों का योगफल में एक के आकर्षण, दूसरा का प्रत्याकर्षण दोनों मिल करके एक कंपन बनता है। और दूसरे विधि से, इसका विलोम विधि से वर्तुलात्मक गति बन जाता है। इस ढंग से कंपनात्मक गति, वर्तुलात्मक गति ये दोनों ये कार्य गति, कार्यशीलता का ही परिणाम है। जैसा हर परमाणु कार्यरत है, क्रियाशील है, किस आधार पर? बल सम्पन्नता वश, ऊर्जा सम्पन्नता, बल सम्पन्नता, चुम्बकीय बल सम्पन्नता वश है, क्रियाशील। क्रियाशीलता के निरंतर प्रेरणा विधि, कार्य विधि 2 अंग हैं। अपने में ही कार्य विधि, अपने में ही प्रेरणा विधि। जैसा नाक खुजवाया, हाथ जा करके उसको खुजवा देता है। जबकि एक ही शरीर है, एक ही यूनिट है। गले में कोई चीज़ अटक गई, उसके आस-पास के पूरे-पूरे membrane हैं, वो इसको ठीक करने के लिए खखारेंगे, खासेंगे, पानी पियेंगे, जो जो करना है, शरीर का अवयव सब मिल करके उसको ठीक करने में लग जाते हैं। कोई एक जगह कट गया, समझ लो, कट गया तो उसको