बंद हो जाते हैं (चुँधिया जाती हैं)। इसी प्रकार से उल्लू [गुग्गु ]का आँख में ये प्रकाश से वस्तु नहीं दिखता, अंधा हो जाता है। ये सब बातें आपके पास विविधता रखी हुई है। कहना ये नहीं है कि ये सिद्धांत पूरा हो गया, ऐसा नहीं है। तो स्वयं में हर वस्तु प्रकाशित है, ये सही है। स्वयं में हर वस्तु प्रकाशित है, ये सही है। हर वस्तु अपने में प्रकाशमान है फल स्वरूप एक दूसरे को पहचानता है। उसका प्रमाण कहाँ से मिल गया? उसका प्रमाण अस्तित्व में रखा है, एक परमाणु अंश दूसरे परमाणु अंश को पहचाना है, तभी परमाणु के रूप में कार्य करता हुआ, हमको समझ में आता है। हरिहर।

प्रश्न : हर वस्तु प्रकाशमान है, क्या दूसरी प्रकाशित वस्तु उसके प्रकाशमानता को बढ़ा-घटा सकती है?

उत्तर : ये प्रकाशमानता को और स्पष्ट करता है, दूसरे के लिए। प्रकाशमानता उतना ही है, चाहे सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ा हो, नहीं पड़ा हो, आपका प्रकाशमानता उतना ही है। और जिसको हम अंधेरा कहते हैं, उसमें भी आप वैसे ही प्रकाशमान हैं, सूर्य के छाया मे भी आप वैसे ही प्रकाशमान हैं। वस्तु का होना = प्रकाशमान। (आँखों का क्षमता नहीं है कि किसी एक स्थिति में देख पायें, किसी एक स्थिति में नहीं देख पायें)। अभी वो तमाम चश्मा बनाये हैं। अंधेरे में देखने वाला।

प्रश्न : ताप और प्रकाश दोनों को अलग-अलग स्प्ष्ट कीजिए?

उत्तर : प्रकाश ताप नहीं है, ताप को प्रकाश नहीं कहते हैं। प्रतिबिम्बन ही प्रकाशमानता है। आपका प्रतिबिम्ब ही प्रकाशित रहता है, आपका ताप प्रकाशित नहीं रहता है। ताप यदि जरूरत से अधिक होता है, तो परावर्तित होता रहता है, चारों जगह में सभी ओर बट जाता है। आपका बिम्ब का प्रतिबिम्ब सदा-सदा के लिए वैसा ही रहता है। प्रतिबिम्बिन क्रिया = प्रकाशमानता। हर वस्तु अपने सिधाई में, वैसे तो अनंत कोण सम्पन्न है हर एक वस्तु। बिम्ब का प्रतिबिम्ब होता है, हर बिम्ब रचना की फलन है। हर रचना, छोटा से छोटा रचना को अभी नाम देते हैं, तो एक परमाणु अंश ही होता है, उससे कम होता नहीं, वो भी एक रचना ही है। क्यों? उसको गणितीय विधि से विखंडित किया जाता है। वो भी एक रचना ही है। ये शरीर भी एक रचना है, अनेक टुकड़े का एक टुकड़ा। एक धोती, अनेक टुकड़े का एक टुकड़ा, एक दीवार अनेक टुकड़े का एक टुकड़ा, एक धरती अनेक टुकड़े का एक टुकड़ा। हरिहर!

प्रश्न : अभी एक बहुत प्रचलित मान्यता है, कि प्रकाश सरल रेखा में चलता है, प्रकाश विशेष प्रकार के कणों से मिलकर बना है, और वो एक सरल रेखा में चलते हैं?

उत्तर : ठीक है, वो ऐसा देखते होगें, ऐसा व्याख्या करते होगें, कण चलता है कि धूलि चलता है, वो स्वयं में चल देता है, उसके बारे में बाद में बात करेगें। हमने जो देखा है, समझा है, हर बिम्ब का प्रतिबिम्ब होता है, हर बिम्ब एक रचना है। एक रचना दूसरे रचना को पहचानने योग्य रहता है, इसी का नाम है प्रतिबिम्बन, जैसा आपका रचना को हम पहचाने, वो ही चीज़ है आपका प्रतिबिम्बन। ये विधि परमाणु अंशों से लेकर सभी बड़े-बड़े ग्रह गोलों तक है। धरती सूर्य को पहचानता है, तभी अपना एक गतिपथ को बनाया है, निश्चित व्यवस्था को देता ही जाता है, ये सब करते ही हैं। सूर्य का प्रतिबिम्ब धरती पर है, उसी प्रकार धरती का प्रतिबिम्ब सूर्य पर भी रहती है। प्रतिबिम्ब गति नहीं है, यहीं से प्रकाशवाद जो हम प्रस्तुत किए हैं, उसमें और असलियत में क्या दूरी है, ये पता लगता है। प्रतिबिम्ब ही

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