ज्योतिषशास्त्र की मतलब है। उसको जीवन के ऊपर प्रभाव नहीं होता है, ये बात अभी ज्योतिषशास्त्र नहीं समझा है और आगे चल करके समझेगा, कालातंर में समझेगा। अभी जैसा विज्ञानी नहीं समझें हैं, वैसे ही ज्योतिषशास्त्र भी जीवन को नहीं समझा है। ज्योतिर्विद जो है, जीवन को समझा है, ऐसा कुछ भी नहीं है। वो भी शरीर को ही जीवन मान करके सारे भविष्य फलों को बताया करते हैं। ऐसा बात है।तो उसके बाद एक आत्मा नाम की चीज़ को मानते हैं ज्योतिर्विद, भारत में, और अन्य देशों में क्या मानते हैं, हम नहीं जानता हूँ। भारत में एक आत्मा को मानते हुए ये सारे बात को गढ़ते हैं, आत्मा से आत्मविद ज्योतिषी होते नहीं हैं। आत्मा को कोई समझा ही नहीं, तो ज्योतिषी क्या समझेगा? आत्मा का नाम का प्रयोग करते हैं, इस ढंग से हम बैठे हैं। तो ये जरूर है - ब्रह्माण्डीय किरणों का प्रभाव शरीर के ऊपर होता है।
प्रश्न : बाबाजी, अगर आप की इस बात को हम लोग मान लें, तो ज्योतिष में जो ब्रम्हज्ञानी बनने का योग रहता है, राजा बनने का योग रहता है, अगर वो जीवन को, जीवन के जागृति के स्थिति को नहीं जानता, तो ब्रम्हज्ञानी योग को किस आधार पर, [क्योंकि ऐसे बहुत सारे महापुरूषों की कुंडलियों का विश्लेषण करने से पता लगा, वाकई अपने युग में वो लोग ब्रम्हज्ञान को उपलब्ध हुए], समाधान को उपलब्ध हुए। आपकी और उनकी बात का तालमेल कैसे होगा?
उत्तर : बहुत साधारण बात है ये, ये आपने बहुत अच्छा पूछा भी है।
अभी ब्रह्मज्ञानी जो हुए हैं, वो तो अपने को नहीं कहा है कि हम ब्रह्मज्ञानी हुए, एक भी आदमी नहीं कहा है। उपनिषद युग तक की ऐसे ही अवधारणा है। उसमें लिखा है, उपनिषदों में, जो कहता है, हम ब्रह्मज्ञानी हो गये बिल्कुल ब्रह्मज्ञानी वो नहीं हैं - ये लिखा है। एक ये चीज़ है। उसके बाद में और कोई कहा होगा तो बात अलग है, तो हम उसको कुछ कहते नहीं हैं। अभी उपनिषद के कथन के अनुसार वो ऐसी ही मानी गई है - “हम ज्ञानी हो गये, इस बात को हम सत्यापित नहीं कर सकते”। तो ज्ञान का जो कुछ भी प्रबोधन की बात है, इशारा करने की बात है, उसको शास्त्र को ही प्रमाण माना है, और दूसरे किसी को प्रमाण नहीं माना है। व्यक्ति को प्रमाण नहीं माना है। अच्छा, लोग बहुत सारे लोगों को ब्रह्मज्ञानी हैं, ऐसा मानते रहें हैं। ये बात, लोगों ने माना है, ये ठीक है। तो इस विधि से हम यहाँ निष्कर्ष में पहुँचते हैं, उसके साथ-साथ ये भी एक हमारे पास गवाही है - मैं जब समाधि को देखा था, देखे हैं, और उस अवस्था में हम ब्रह्मज्ञानी हो गया हूँ, ये हम स्वयं नहीं कह पाते थे।
ये ज़रूर है, ये जो शास्त्रों में लिखी हुई एक बात अवश्य उसमें गवाहित हुई – तो वो “सुख-दुख से परे” एक बात कहते हैं, शस्त्रों में लिखी हुई है। तो सुख का भी हम गवाही नहीं कर पाते थे, ना दुख का गवाही कर पाते थे। इसी घटना को यदि सुख-दुख से परे हम माना जाए, वो लिखा हुआ ठीक है। एक बात ये थी। सही गलती को भी हम बताने में असमर्थ रहे, हम निर्धारित नहीं कर पाते रहे। ये बात ज़रूरी है, कोलाहल संसार से, संसार को दुख मानने वालों के लिए ये समाधि स्थली बहुत राहत वाला जगह है। ये मेरा कहना है। इसको मैं भले प्रकार से देखा हूँ।
दूसरा आपने बोला था - ब्रह्मज्ञानी होंगे वगैरह, राजा होंगे ये हो गया, सही हुआ है, इत्यादि। सही को ही हम मान के चलें, हम दूसरे भाग को लेवे ना करें। तो यदि दस जगह में ठीक हुआ है, चार जगह में नहीं हुआ है, या बीस जगह में ठीक नहीं हुआ, उसको हम नहीं जाएंगे। हम सही हुआ है, उतने को ही ले के चलेंगे। इस बात के लिए ये जो अभी