प्रश्न : स्वेक्षा पूर्वक संसार उनको धन नहीं देता है? राजयोग में, सवेक्षा पूर्वक संसार उनको धन अर्पित नहीं करता है, वो हड़पता ही है?

उत्तर : हाँ, दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है।

प्रश्न : स्वेक्षा पूर्वक, उपहार स्वरूप, दान स्वरूप ऐसा नहीं है? हड़पने की स्थिति नहीं आयी, जैसा विवेकानंद ने विश्व का दौरा किया और उनको अरबों रुपयों की सहायता लोगों ने दी। उसको तो, राजा जैसे ही जिया, शान के साथ जिया, बहुत सम्मानित हो के जिया, वो भी एक राजयोग था, सन्यासयोग के साथ। तो हर बार राजा लोग हड़प के ही बड़े आदमी बने ऐसा कहाँ सिद्ध हुआ? कुछ लोग उद्योग धंधा करके बने, कुछ लोग अपनी प्रतिभा से बहुत संपत्ति बढ़ा कर बने?

उत्तर : वो बात को अपन नीर-क्षीर, न्याय कर सकते हैं। तो अधिकांश राजयोग का अर्थ वही है, जो मैंने पहले कहा है। अब रह गया विवेकानन्द जी वगैरह की बात लाये। इसमें स्वधन में ये बात लिखी हुई है, कि परितोष और पुरस्कार रूप में जो कुछ भी प्राप्ति होती है, प्रतिफल रूप में जो प्राप्त होती है, इसको हम स्वधन के नाम से प्रतिपादित किया है। उसमें हम सही हैं। उस बात से हम खरे उतरते हैं।तो इसी क्रम में विवेकानन्द जी, गांधी जी स्वयं में उपार्जन नहीं किए, किन्तु उनको परितोषक द्रव्य बहुत कुछ मिला। उसको एक अच्छी ढंग से, एक जगह में संग्रह करके, लोकोपकार के लिए अर्पित करके इन लोग चले गये। वो स्वयं में कितना उपयोग किया हम नहीं जानते हैं, किन्तु वो जितना उपयोग किया उससे ज्यादा संसार के लिए अर्पित करके ही गए हैं, ऐसे मेरा सोचना है। तो ऐसे लोग कई हुए, कई लोग ऐसा किये हैं। तो इसमें से एक व्यक्ति विवेकानन्द जी भी हैं। विवेकानन्द ट्रस्ट में इस बात को देखा जा सकता है।

वैसे ही गांधी स्मारक निधि में भी ऐसी ही चीज़ देखा जा सकता है। तो इस प्रकार की कई नजीर अभी रखी हुई है।अभी एक बहुत बड़ी भारी फोर्ड नाम की एक आदमी था, वो बहुत बड़ी भारी धनाढ्य हुआ, उनका एक trust है, संसार को हर वर्ष अरबों रूपया बाँटता है, Ford Foundation, वो करते हैं, Rockefeller Foundation, ऐसा कई चीज़ें हैं, वो उन लोग पैसा बाँटने के अर्थ में बने ही हैं। इसको अपने को अच्छी तरह से समझना बनता है। इस बात को यदि हम ठीक से समझ पाते हैं, तो उसमें राजयोग का जो बात आती है, उसको हम अच्छी तरह से प्रतिपादित कर सकते हैं। तो विवेकानन्द जी वाला परमहंस योग - यदि वस्तु प्राप्त होते हुए भी उसको जो त्याग देते हैं, उसको हम परिव्राजक योग कहते हैं - वस्तु हमको बहुत प्राप्त हो गई, उसको हम उपयोग नहीं करते हैं, जन उपयोग के लिए अर्पित कर देते हैं, इसको परिव्राजक योग नाम दिया है।

इस प्रकार की योग से भी ऐसे महापुरुषों को और मूल्यांकन किया जा सकता है। राजयोग से परिव्राजक योग बहुत दूर है। उसमें जो है ना एक प्रकार से हठ पूर्वक, बल पूर्वक, छल पूर्वक हड़पने की बात आती है - राजयोग में, जबकि परिव्राजक योग में जो एक पुरस्कार रूप में, परितोष रूप में, सम्मान रूप में, सम्मोहन रूप में सम्मान करने की बात आती है। इन बातों में दोनों में बहुत अंतर है। जैसा हम ही हैं - बच्चों के लिए कुछ भी हम न्योछावर कर देते हैं, कुछ भी पैसा खर्च कर देते हैं, वही चीज़ बल पूर्वक हमसे दो रूपया छीनने के लिए कोई आदमी तैयार होता है, उसमें हम सिर कटाने के लिए तैयार हो जाते हैं, सिर काटने के लिए, तैयार हो जाते हैं। ये देखने में ये कितना बड़ी-भारी

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