बताया था, ब्रह्माण्डीय किरणों के आधार पर, जो कुछ भी वस्तु के ऊपर ही बात है, वस्तु के ऊपर प्रभावित होता है। तो ब्रह्मज्ञानी को पहचानने की विधि - विरक्त होना, और वस्तुओं से रिक्त रहना - के योग को पहचाना गया है। उसको विरक्ति योग, विरक्ति का मतलब ही यही होता है, वस्तु संग्रह सुविधा से दूर रहना, इसी को विरक्ति कहा गया है। ये बात वस्तु से ही संबंधित है। ये उस ढंग से सन्यासियों को बताया है, परिव्राजक योग बताया है, ये बात भी हमको समझ में आता है।
प्रश्न : बाबाजी ब्रम्हज्ञान का योग भी बताया।
उत्तर : ऐसे विरक्ति को ब्रम्हज्ञान होने का योग है, ऐसा कहा होगा।
प्रश्न : नहीं बाबा ऐसा नहीं है, बाकायदा आत्मज्ञान, ऐसा साफ-सुथरा लिखा है।
उत्तर - ठीक है बाबा, भाषा में कहने के बारे में हमको कोई एतराज नहीं है, उस को प्रमाण तो कुछ होता नहीं है ना व्यवहार में। तो इसको तो आपने सुन लिया “हिमालय के योग से, अध्यात्म से, व्यवहार से लेन-देन नहीं”। ब्रह्मज्ञानीयों के बारे में ही मैं कह रहा हूँ बाबा, जैसा समाधि को आप क्या कहेंगे - ब्रह्मज्ञानी मानोगे कि नहीं मानोगे? मैं स्वयं गवाही कर रहा हूँ - हम ब्रह्मज्ञानी हो गया हूँ - इस बात को समाधि की स्थिति में हम बताने में असमर्थ रहे। मैं स्वयं गवाही कर रहा हूँ! आपके सम्मुख एक जीता जागता हुआ एक आदमी है! उसके बाद क्या बात है? ये सच्चाई की बात है। हम ये नहीं कह सकते हम ब्रह्मज्ञानी हुआ, सही और गलती को हम नहीं बता सकते। हम समझा हूँ - इस को भी नहीं बता सकते, नहीं समझा हूँ ये भी नहीं बता सकते। हम सुखी हो गया हूँ - ये भी नहीं बता सकते, हम दुखी हूँ - ये भी नहीं बता सकते। ऐसे स्थिति में तो हम स्वयं रहे हैं। इस बात से ही हम आपको ये बताया - शास्त्रों में लिखी हुई वो बात सच्चाई उतरती है - जो सुख दुख से परे है - ब्रह्मज्ञान। ये बात से हम संतुष्ट हो सकते हैं तो ऐसे ब्रह्मज्ञानी हो सकते हैं – जिन-जिन को समाधि होता है वो सब ब्रह्मज्ञानी हैं। इस ढंग से बनता है।
विरक्ति के आधार पर ही हम ब्रह्मज्ञानी होने कि यदि तीव्र रूप में यदि विरक्त होने की योग आता है, वस्तुओं से दूर रहने की योग बनता है, ऐसे स्थिति में ये ब्रह्मज्ञानी हो सकता है, ऐसा हम भविष्यवाणी कर ही सकते हैं, ऐसा मेरा सहमति है।
दूसरी और - ये राजयोग की बात। राजयोग के बारे में ये है, यही हमारा अभी तक की सोचने की मुद्दा बनी हुई है, राजयोग का मतलब है - दूसरों की वस्तुओं को ज्यादा से ज्यादा जो हड़प सके, वो सब राजयोग है। (पुराने समय में ऐसा ही था), आज भी वैसे ही है। आज भी राजयोग का मतलब वहीं जाता है - दूसरे का वस्तुओं को हड़प के अपना बनाने में समर्थ होता है - ऐसे व्यक्तियों को हम राजयोगी कहते हैं - ज्योतिष के अनुसार। वही मुद्दा है हमको विरक्ति पैदा किया। किससे? ज्योतिष से। हमको ये पटा नहीं, हम इसमें सहमत हो भी नहीं सकते। ठीक है? किन्तु ये होता है ये ज़रूरी है। राजयोग जिसको होता है, वो संसार के धन को अपहरण करते हैं, हड़पते हैं, सारा झूठ बोलते हैं, उसके बाद भी अच्छे आदमी बने रहते हैं।