घटित थीं, आज उतना दुर्घटनाएँ नहीं हैं। औसतन[1] दुर्घटनाएँ घट गई। किन्तु मानसिक रूप में वहीं का वहीं है। दुर्घटना को घटाने की मानसिकता तो है मनुष्य के पास, किंतु दुर्घटनाओं को घटित करा नहीं पाता है। कम हो गया। अभी एक हज़ार वर्ष पहले दिन में दो बार युद्व होता था। अभी कई वर्षों में एक बार देश के सम्मुख युद्व की स्थिति बनती है। ये बात आज के उन दिनों के बीच में बात है। एक हज़ार वर्ष पहले आदमी के पास कल के लिए दाना-पानी जुटाना इतना आसान game नहीं रहा। कल के लिए एक हज़ार वर्ष पहले, दो हज़ार वर्ष पहले, कल के लिए हमारा दाना-पानी सुरक्षित है - इसको सोचना बड़ा दुष्कर था, अधिकांश लोगों के पास। आज उसका विलेाम है। आज अधिकांश लोगों के पास कल के लिए दाना-पानी सुरक्षित है, इस जगह में आदमी आ गया है। इन दोनों चीज़ को हम ध्यान में रखते हुए ज्योतिष तंत्र को हम सोचते हैं, इष्ट अनिष्ट घटनाओं के बारे में, उन दिनों में जैसा हम भविष्यवाणी करने के लिए आधारों की सोचते रहे, आधारभूत बात तो जीता हुआ, रोजमर्रे को देखकर ही ये आधार बनता है, रोजमर्रे के आधार पर ही भविष्यवाणी किया जाता है। तो आज की रोजमर्रे की आधार का आकार है ना, ये दो हजार वर्ष, एक हजार वर्ष पहले की आकार से भिन्न हो चुकी है। आज जो है, परिवेश भिन्न होने के आधार पर ज्योतिष को एक सटीक प्रस्तुत करने के लिए पुनर आयामों को पहचानने की आवश्यकता है।पुनर आयाम क्या चीज़ है भाई? आदमी का जो आज की मानसिकता है - धरती को स्वस्थ बनाने की मानसिकता - सर्वाधिक लोगों में है। धरती स्वस्थ रहेगा तो कल हम भी रहेगें, नहीं तो धरती में हम रहवे नहीं करेंगे। एक मानसिकता ये है। धरती को स्वस्थ बनाए रखने के लिए जो पर्यावरण समस्या है, उसका निराकरण - एक।

दूसरा - उसके बाद आता है, मनुष्य परंपरा में जो बनी हई व्यापार बुद्वि है, उसको समृद्व बुद्वि की ओर दिशा देना। वो दिशा चाहता है आदमी, दिशा अभी स्पष्ट नहीं है। उसमें कितना सफल होगा, नहीं सफल होगा, इन आयामों पर सोचने की आवश्यकता है। हर परिवार समाधान, समृद्धि पूर्वक जीना चाहता है, इसमें सफल होने की दिन कब आएगा, इसको सोचने की आवश्यकता है। इसके लिए उपायों को सुझाने की आवश्यकता है। ये विभिन्न आयामों को पहचानने की आवश्यकता पर हमारा बल ये है। इस ढंग से हमको सोचने की आवश्यकता है। तभी ज्योतिष की सार्थकता को हम ले जाएंगे।

दूसरे और एक आयाम है, वो इससे इतना ही बलवती है। वो है – मानव को मानवीयता पूर्वक जीने के दिन कहाँ हैं? राक्ष्सियता, पाशवियता से जीने के दिन को ज्योतिष ने अच्छी तरह से परिगणना कर लिया। इसमें हमको कोई शंका नहीं है। मानवीयता पूर्वक जीने की दिन कब से शुरू होगा और उसके लिए क्या उपाय करना होगा? इस dimension में अपने को बहुत काम करने की जरूरत है। ये मौलिक कार्य होगा, मानव के लिए देन होगा, उपकार होगा, परंपरा स्वस्थ होने के लिए एक साधन बन जाएगी। ऐसा मेरा सोचना है। इस पर आप हमको काम करना चाहिए।

प्रश्न : एक व्यक्ति के जिन्दगी में करोड़ों मील दूर के ग्रह नक्षत्रों का प्रभाव कैसे प्रभावी होता है, जिसकी कई बरस पहले भविष्यवाणी कर देते हैं और वो भविष्यवाणी सही साबित होता हैं। वो प्रक्रिया क्या है, और उससे बचने के जो उपाय बताये गये हैं, जिन उपायों को कई स्थानों पर कारगर होते हुए भी हम लोगों ने देखा। तो उन उपायों की

  1. ओसतन : औसत के हिसाब से (on an average)

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