कल्याण हो,( भेजा हुआ आदमी ) का कल्याण हो, ऐसा मैंने आशीष दिया। खतम हो गई बात। उसके बाद हमको कुछ लोग मंत्रणा देने लगे, पुनः लिखो उसको।
ये हमारा काम नहीं, वो जिस काम के लिए भेजा था वो काम पूरा हो गया, समाप्त हो गया, खतम हो गया। तो अब मणि के बारे मे हम क्या कर डालूँ? वो भेजा तो हम पहन नहीं पाए, थोड़े ही दिन मे वो निकल गया। अब मणि के बारे में असर हम क्या बताऊँ? अभी संसार में हम सुनते हैं, क्या सुनते हैं? वो पहना ये पहना, हमको वो हुआ, ये नहीं हुआ। कोई - कोई कहता है हमको कुछ नहीं हुआ, पहले जैसे ही है। कुछ लोग कहते भी रहे, इसको पहना, वहाँ जाते रहे, गाड़ी बड़ी slip हो गई बाल-बाल बच गए। ऐसा भी कहते हैं। ये सभी चीज़ सुनने में आता है, इसके लिए हम क्या कर डालूँ! क्या चीज़ को हम सही मानूँ भाई, जो मणि नहीं पहनते हैं वो भी बाल-बाल बचते हैं। ये सभी बाते संसार मे चल रही है। हम यदि निर्धारण सिद्धांत के रूप मे, प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करने के लिए अपने को शायद इन सभी विधा में, बहुत सारा अपने को अर्पित करने की जरूरत है। परीक्षण निरीक्षण करने की आवश्यकता है, प्रयोग करने की आवश्यकता है, data निकालने की आवश्यकता है। ऐसा मेरा सोचना है।
तो इसी तहत मे अभी अंतिम परिणाम क्या हुआ प्रसंग आयी थी, अमावास्या पूर्णिमा के प्रकिया में, वो इनमें पागल होने वाला अपने को स्वीकार नहीं है, ज्ञानी होने वाला स्वीकार है। ज्ञानी होने के लिए सर्वाधिक लोगों के सामने क्या उपक्रम किया जाए, उसको चिंतन किया जाए, सोचा जाए, समझा जाए, उसमे अपने को लगाया जाए। यही सहायता हो सकता है। दूसरा क्या सहायता करे? आप ही के presentation के अनुसार हमको क्या करना चाहिए वो बात निकाल करके आई, ठीक है ना? ये आगे चलते हैं।
प्रश्न : बाबा pyramid के बारे में माना जाता है, उसमें बैठने पर शरीर स्वस्थ रहता है, संयम वाली प्रवृत्ति भी बनती है, एकाग्रता बढ़ता है?
उत्तर : फिर तो एक एक pyramid बनाया जाये, उसके अंदर बैठा दिया जाए। इसमें कुछ सही नहीं है। pyramid नहीं, क़ब्रिस्तान मे बैठ जाओ तो भी उतना हम सोचते रहते हैं उतना ही हाल। वो pyramid भी वोही क़ब्रिस्तान ही तो है। तो हमारा कहना है, मनुष्य अपने में जैसा रहता है, उससे ना तो कोई अधिक होता है, ना कम होता है। इसमें हो जाता है तो ज्ञान ही हो जाता सबको, एक-एक ठो क़ब्रिस्तान बनाओ, या नाहीं तो pyramid बनाओ, उसके अंदर बैठा दिया जाए, सब ज्ञानी हो जाए। क्या बुरा हुआ! ये सब हमारा परिकल्पना की हविस है महाराज जी।