प्रश्न : बाबा specific question इसमे ये बनाता है कि अमावस्या और पूर्णिमा के दिन मानसिकता उछाल खाती है उसका कारण क्या है?
उत्तर : उछाल खाने का कारण यही है पहले से उसका foundation बना रहता है 15 दिन। (15 दिन क्यों 16 दिन भी हो सकता है बाबा?) ठीक है 16 दिन मे भी हो सकता है मान लेते हैं, आस पास ये भी कह रहे हैं महाराज, हम उसको उसको नहीं कह रहे हैं actuality, वो meredian line बना नहीं रहे हैं।
प्रश्न : जैसा ज्वार भाटा धरती के कंपनात्मक गति के कारण होता है, क्या धरती की कंपनात्मक गति मानव में किस तरह से प्रभावित हो रही है, क्योंकि मानव में कंपनात्मक गति जो जीवन परमाणु में है, धरती की कंपनात्मक गति और मानव की कंपनात्मक गति का कोई link है क्या?
उत्तर : वो link की बारे मे अस्तित्व में सम्पूर्णता से एक और, एक से सम्पूर्ण जुड़ा ही है। इस ढंग की इसका संबंध बना हुआ है। (सभी एक दूसरे को प्रभावित कर रहे है।) एक दूसरे को प्रभावित ना करें, ऐसा होता ही नहीं है।
प्रश्न : इसीलिए पृथ्वी का जो विशेष कंपन है, मानव के कंपन को प्रभावित करता है?
उत्तर : करता ही होगा। क्या आपत्ति हुई? जब तक आदमी शरीर को जीवन समझता रहता है, तब तक जीवन प्रभावित होता रहता है। जब जीवन ज्ञान हो जाता है, शरीर प्रभावित रहता है जीवन प्रभावित नहीं रहता है। बात इतनी ही है।
प्रश्न : तो जो बाबा ये जितनी भी घटनाएँ हुए और जिसके साथ भी हुए जब मानव जीवन को शरीर मान रहा होता है?
उत्तर : इतना ही बात है। इसीलिए (देखो बाबा ऐसा मानने के बाद एक बहोत बड़ा सवाल खड़ा होता है कि ज्ञान के संदर्भ मे शरीर को तो कोई ज्ञान होगा नहीं, जीवन को ही जीवन ज्ञान होता है) ऐसी ही मान्यता है। (तो सर्वोच्च अवस्था मे जीवन में तिथि का नियम उसके ऊपर लागू हो रहा है, मतलब वो तिथि वाला जैसे पूर्णिमा की तिथि को ज्ञान होता है। शरीर भाव को लँघ के जीवन भाव मे चला गया वो सर्वोछ स्थिति हो गई।) ठीक है, सवाल के बारे मे देखो बाबा, ज्ञान तो कोई ना कोई दिन समाधि होना ही है। समाधि को ही हम ज्ञान कहेंगें। कोई ना कोई एक दिन को हम समाधी का दिन कहते हैं। तो उसके पीछे ये भी लगा रहता है, जैसा अपन छपवाते हैं, 14 जनवरी शरद पूर्णिमा और कोई ऐसा तिथि देते हैं, उसके पीछे में क्या चीज़ है? इसको मंगलमय दिन हम स्वीकारे रहते हैं। ये भी इसके पीछे continue कर रहा है, run कर रहा है। ये भी norm जो है काम कर ही रहा है। और घटना भी होती ही है। ये तो हमारा भी सोचना ऐसा है, पूर्णिमा के दिन आदमी ज्यादा प्रसन्न होने का तिथि बनाता है।
अच्छा मेरा भी अनुभव ऐसा ही है, जो इसके पहले जो कविताएँ ज्यादा से ज्यादा लिखा है, पूर्णिमा का दिन बहुत ज़्यादा कविताएँ लिखा है। ये भी बात आता है। ये सब जो है ना मनुष्य की खिलने की कारण है। वो उसका कारण में यही है, वो सुखद प्रकाशी हो सकता है, इसके इलावा कुछ हो नहीं सकती। और कोई चीज़ हमको मिल रहा है, ऐसा हमको नहीं लगता। इसको आँकलित करना, ध्रुविकरण करना, यही दिन ज्ञान होता है उसको पता लगाना, वो