उत्तर : ठीक है, मान लेते हैं क्योंकि किसी के योग में वो कार्य करने लग गए, इसीलिए अर्ध विद्युत ग्राही अपन नाम रख लिया। आप जो कहते हो उसमें हम सहमत हैं, हमारा कोई प्रति-तर्क नहीं है। हम उसमें सहमत हैं। किंतु प्रदर्शित रूप में, जैसा लकड़ी को लगाया, ये विद्युत ग्राही नहीं है, ऐसा आप कहते हैं। ये लकड़ी सब परमाणुओं का ही संगठित स्वरूप। इस संगठन में विद्युत बल लगाये बिना संगठन कहाँ से आ गया? आप ही सोच लो! विद्युत बल लगी ही है, आप जिस measurement की, आप हम जिस तादात की, जिस गति की, जिस दबाव की, कम से कम स्थिति को हम पहचाने हैं, वो ये ग्रहण नहीं करता, इतना कहा जा सकता है। उससे छोटा, उससे छोटा, उससे छोटा कोई ना कोई छोटे अंश में वो विद्युतग्राही है ही है। हर वस्तु विद्युतग्राही इस ढंग से है। उसका तादात, उसका मापदण्ड़ हमारे कब्जे में नहीं है, इसीलिए हम उसको विद्युतग्राही नहीं है हम कह रहे हैं। कितना बढ़िया रे! इस ढंग से, अणु, अणु रचित रचनाओं के रूप में होने के प्रमाण के आधार पर, जिसको हम विज्ञानी बनाए नहीं है, ना ज्ञानी बनाए हैं, ना अज्ञानी बनाए हैं!
(हम जितने प्रकार के बल की व्याख्या वैज्ञानिक आधार पर किए हैं, ये उनके प्रकाशनों के आधार पर ही हम बोल रहें हैं।)
कोई ऐसा परमाणु नहीं है जिसमें विद्युत बल ना हो, विद्युत चुम्बकीय बल ना हो, ध्वनि ना हो, भार ना हो, उसके पश्चात गति ना हो, स्थिति ना हो, ऐसा कोई एक परमाणु को आप हम पहचान नहीं सकते। ये सभी तमाम वैभव एक परमाणु में ही निहित हैं। (तापमान?) ताप रहता ही है। विद्युत, चुम्बकीय बल, भार, ताप, ध्वनि - ये पाँचों चीज़ एक परमाणु में निहित रहता ही है। तादात की बात आती है, हम व्यवहार में लाने के लिए, जितना तादात की जरूरत है, वो तादात में नहीं रहता है, वो बात अलग है।
जैसा परमाणु ज्ञान होता है, परमाणु को व्यवहार में व्यवहृत नहीं कर पाएँगें। परमाणु का आदान-प्रदान करोगे? नहीं करेंगें। किन्तु परमाणु के बारे में हम बहुत सारा चर्चा भी करते है, ज्ञान भी रखते हैं, उसके वैभव के ऊपर यकीन भी करते हैं, उस ढंग से हम फलित भी होते हैं। ये भी नहीं है ये कुछ करने में कम है, ऐसा नहीं कह रहा हूँ। ये सब फलित भी होते हैं। इस ढंग से अभी जितने भी बलों की हम पहचान किए हैं, वैज्ञानीक विधि से, अज्ञान विधि से, ज्ञान विधि से, कुछ भी हम बल को पहचान पाए हैं, वो सारे बल एक परमाणु में ही विद्यमान है। हम जिस वस्तु को विद्युत ग्राही मानते हों, चाहे नहीं मानते हों, सब में यह चीज़ निहित हैं। तादात की अंतर है, तादात परमाणु के अंशों के आधार पर अंशों का संख्या भेद से उसके वजन वग़ैरह में अंतर आ जाती है। ये तो स्वाभाविक बात है। अंशों का संख्या भेद हो गया तो वजन में भेद हो गया तो कार्य फल को स्वयं में रखने का अधिकार भिन्न हो गई। कार्य फल का अपने में बनाए रखने के अधिकार भिन्न हो गई। इस आधार पर भिन्न-भिन्न दिखता है। इस ढंग से गुरूत्वाकर्षण का जो हमारा परिकल्पना है, जो एक बड़े चीज़, छोटे चीज़ को रख करके करते हैं, उसको भार के रूप में हम अच्छी तरह से पहचान सकते हैं। किन्तु गुरूत्वाकर्षण को आकाश में फेंकी हुई कोई वस्तु के साथ गुरूत्वाकर्षण के आधार पर हम बात करते हैं। उसके आधार पर अपन काम भी किए हैं आकर्षण बल से मुक्त कराने के लिए एक ऐसे गति प्रतिष्ठा पैदा किया जिसको हम velocity कहते हैं, उससे ये भार क एक प्रकार से नाक करके, लांघ करके वो अपना गति में प्रतिष्ठित होता है, उसको जितने भी आकाशगामी यंत्रों में इसको परीक्षण किया गया है।