उत्तर : तो घृणा करते रहो, घृणा को आप ही ना व्यक्त करोगे। घृणा तो कचड़े में नहीं है ना।
प्रश्न : उससे प्रभावित तो हुए ना बाबा?
उत्तर : पुनः वही बात। वातावरण से कचरा, गंदगी से शरीर प्रभावित होता है। घृणा आप काहे को करते हो? जिससे कि आपके स्वास्थ्य पर प्रभाव ना पड़े। बात ठीक है? ये बात आती है। सच्चाई तो ऐसे ही है। ठीक है ये?
प्रश्न : बाबाजी लेकिन ऐसा देखने मे आया जैसा अपन उदाहरण के लिए लें कि पूर्व दिशा में जो मकान में लोग रहते हैं तो उनमें एक गुण अच्छा पाया जाता है वो अधिकार प्राप्ति के लिए बढ़ते हैं और दूसरा उनमें ईमानदारी होती है। दूसरा ऐसे दक्षिण दिशा की ओर लें, तो उनमें छत्रीय गुण ज्यादा होता है ऐसा दिखने में भी आया है, इसको मतलब नकार नहीं सकते, तीसरी जैसे पश्चिम दिशा में तो उनमे थोड़ा सा business minded होते हैं वो, और उठा पटक ज्यादा करते हैं। उत्तर की तरफ थोड़ा सा शांति प्रिय होते हैं वो। ऐसा दिखने में भी आता है, केवल सुनी सुनाई बाते नहीं हैं बाबजी। तो ऐसा कैसे होता है, अलग अलग दिशा में अलग अलग प्रभाव पड़ता ही है?
उत्तर : देखो बेटा एक practical बात, हम जो feel करते हैं। हम एक धर्मशाला में रहते हैं, ठीक है? हम जिस धर्मशाला में रहते है, उसका दरवाजा पूर्व की ओर है। हम रहते हैं और उसी में एक compartment है, जिसका दरवाजा उत्तर की ओर है। इन दोनों को यदि हम comparatively study किया जाए, पूर्व की ओर और उत्तर की ओर दरवाजा है, आप स्वयं मूल्यांकन कर सकते हैं। आप ही करो देव।
प्रश्न : उसको थोड़ा सा clear बात दीजिए ना बाबाजी।
उत्तर : clear यही है सर्वाधिक झगड़ा जो है, उत्तर के ओर जो मुहँ है, वहीं रखी है, एक। दूसरा, और एक आपको ये कहना चाहते हैं, वहीं हमारा जो compartment है, हम पूर्व की ओर हैं, ठीक है, हमारा बगल में ओर एक compartment है, वो भी पूर्व के ओर ही है, उनका दिमाग की बत्ती खसक गई। उस combination में हम हैं, हम आपको ये बताना चाहते है। ये 70, 80 वर्ष पहले बनी हुई एक धर्मशाला है। उस धर्मशाला मे मैं रहता हूँ। आधा धर्मशाला में मैं रहता हूँ, मैं वहाँ निवास करता हूँ, वहाँ साधना किया हूँ, वहाँ हमनें जो ज्ञानार्जन किया, विवेकार्जन किया वो अलग है। ये व्यक्ति के साथ ये बात जुड़ा है, वास्तु के साथ जुड़ा है, आप ही शोध करो। आप आओ वहाँ रह करके चार दिन शोध तो करो देव, कुछ तो करो, हम भी पतिया जाऊँ। हाँ यदि authenticity चाहते हैं तो ऐसा ही होगा। सांत्वना लगाने के लिए तो बहुत सारा विधियाँ हैं। उसमे हम कुछ नहीं कहेंगे। authenticity पाना होगा तो, महाराज जी detail में जाना ही होगा। मैं स्वयं, स्वयं भी मेरा होना आप मानोगे कि नहीं मानोगे, नहीं मानोगे? क्या है तुम्हारा कहना? मैं हूँ की नहीं हूँ? ठीक है ना, आप जैसे ही मैं भी हूँ ना।
सीधी-सीधी बातें हैं ये। तो आप आकर के हमारे साथ रहो, वहाँ अध्ययन करो। अच्छा और एक बात कहते हैं, वो सात्विक होते हैं बताए थे आपने, उत्तर की ओर वाले, शांति प्रिय होते हैं, सात्विक होते हैं ऐसा बताए थे। ठीक है मान लिया, महाराज जी सारा कचरा वहीं खाते हैं, जबकि सामने मंदिर रखा हुआ है। नर्मदा मंदिर वही सामने रखा है। ठीक है, सारा धरती की कचरा जितना आप मानते हैं मैं मानता हूँ, ये मानते हैं, वो मानते हैं, वो सारा कचरा वही