प्रकाश है, प्रतिबिम्ब गति होती नहीं। नित्य स्थिति है ये, बिम्ब का प्रतिबिम्ब रहता ही है। प्रतिबिम्ब दौड़ना नहीं है। बिम्ब होता है तो उसका प्रतिबिम्ब उसके सीधा line में बना ही है। कितने कोणों में बना है? अनंत कोणों में बना है। प्रत्येक एक अनंत कोण सम्पन्न है। इस विधि से प्रतिबिम्ब सभी ओर रहता ही है।
प्रश्न : एक bulb के सामने तीन cardboard के टुकड़े रख देते हैं। तीनों के बीच में एक एक छेद रहता है। जब वो तीनों छेद एक सीध में हो जाते हैं, तो तीसरे cardboard के बाहर भी वो bulb का प्रकाश दिखता है, परन्तु बीच वाले को यदि हम थोड़ा सा हटा देते हैं, या किसी को भी हटा देते हैं जिससे वो सरल रेखा जो बन रही थी, तीनों छेदों में वो हट जाती है, तो ऐसी स्थिति में फिर उसका प्रकाश आखरी तक पहुँचता नहीं है।
उत्तर : इस आधार पर ये लिखा है, कहीं भी सिधाई वो ही है, जिसका प्रतिबिम्ब पड़ सके। जैसा आप खड़े हो, ये दीवाल आपके सरल रेखा में है, मैं सरल रेखा में, चारों तरफ वस्तुएँ सरल रेखा में - सभी ओर आपका प्रतिबिम्ब है। तो आपको यहाँ इतने में घेर दिया जाए, वो जो घेरा हुआ वस्तु के ऊपर आपका प्रतिबिम्ब सभी ओर रहता है, ऐसा है। उस बुद्धिहीनता को आप कैसे-कैसे बताते हो, आप ही सोच लो। ये सब आदमी को गुमराह बनाने की हो गई की नहीं? ये प्रयोग का तरीक़ा आदमी को गुमराह बनाने की है।
प्रश्न : प्रकाश नहीं है, या ताप नहीं पहुँचा है?
उत्तर : ताप की बात कह ही नहीं रहे हैं। सूर्य का प्रतिबम्ब पहुँचना।
प्रश्न : ये बताइयें bulb का प्रतिबिम्ब उधर क्यों नहीं पहुँच रहा है?
उत्तर : bulb का प्रतिबिम्ब किसी अपारदर्शक वस्तु के ऊपर प्रतिबिंबित होता है। आपका भी वोही हसरत है, सूर्य का भी वैसे ही हसरत है।
प्रश्न : मतलब प्रतिबिम्ब तो सरल रेखा में चलेगा?
उत्तर : सभी ओर सरल रेखा है, तुम जो चाहते हो वोही सरल रेखा नहीं है।
प्रश्न : जैसे तीन cardboard रखें है, पहले cardboard से दूसरे cardboard तक चला गया हटाने पर भी, फिर घूम के जा सकता था।
उत्तर : सभी ओर सीधा है, कोई भी प्रतिबिम्ब कोई भी अपारदर्शक वस्तु के ऊपर पड़ता है, प्रतिबिम्बित होता है।
प्रश्न : उसका अनुबिम्ब बनता है या नहीं?
उत्तर : बनता है ना। वो बनने की विधि को अध्ययन करने के और आगे पड़ाव पड़ता है।
प्रश्न : अभी आप जो बोल रहे हैं कि प्रतिबिम्बन ससम्मुख होता है?