वो गेंद को हम और पास लाया, और पास लाया, और पास लाया, जो हमारा दृग बिन्दु जितना दूर पर उसको बराबर देख सकता था, जितना लम्बा है, चौड़ा है, उससे पास आने के बाद वो हमारे दृष्टिपाट को ढ़क देता है, माने हमारा दृष्टिपाट यहाँ आते तक में जितना चौड़ा है, उससे ज्यादा वो वस्तु बन जाता है। बन जाने के बाद,पुनः पूरा पास में आने के बाद वो वस्तु भी नहीं दिखता है।
वस्तु सभी ओर सत्ता का घेरा होना चाहिए, तभी दिख पाता है, नहीं तो नहीं दिखेगा। वस्तु दिखने के लिए ये सभी ओर से दृष्टि को दृष्टिपाट के अंदर होना चाहिए, दृष्टिपाट से छोटा होना चाहिए, तभी वस्तु दिखेगी, नहीं तो दिखेगी नहीं। दृष्टिपाट से बड़ा होने की कोई चीज़़ है तो विशालता ही है, अभी हम 90° के बात किया, ये इस 90° को चार बार घुमा देने से 360° हुई। ये 90° में इस सारे विशालतम वस्तुएँ कितना आ पाते हैं, उसको नापने की बात आती है, जब हमारे दृष्टिपाट में आने वाली पूरा दूरी को यहाँ से करोड़ मील दूर के बाद नापने जाओगे, तो कितना होगा, आप ही सोच लो, अरब मील के बाद जो होता है, उसको सोच के देखो। दृष्टिपाट हमारा फैलती चली जाती है, दृग बिन्दु छोटी होती चली जाती है, यदि हमारा दृग बिन्दु के अन्दर जो वस्तु आता है, वो दूर जाते जाते, छोटा होता है, जबकि दृष्टिपाट चौड़ा होता जाता है, और पास में आने से हमारे दोनों आँखों के बीच की दूरी से यदि चीज़़ बड़ी हो जाती है, वो दिखता ही नहीं।
दूसरा इन दोनों आँखों के मिलन बिन्दु के पहले कोई निश्चित दूरी है वहीं तक वस्तु दिखती है, उसके बाद दिखता ही नही। इस ढ़ंग से दृष्टि और प्रकाशमानता, प्रकाश की बात बनती है। हमारा दृष्टि में प्रतिबिम्ब आना ही देखने का मतलब हुआ। कोई भी प्रतिबिम्ब हमारे आँखों में आने से, नहीं आने से देखना नहीं हुआ। नहीं दिखता है, उसका दो स्थिली हो गई, इतना दूर हो गया, वो चीज़़ ही नहीं दिखा, या इतना पास हो गई तभी भी नहीं दिखा। वस्तु तो रहता ही है, आँखों में से देखने के लिए बहुत सारा ये components है। आँखों से निश्चित दूरी पर भी होना है, निश्चित दूरी तक ही होना है, इसके बाद में भी नहीं दिखेगा, इससे पहले भी नहीं दिखेगा। ऐसा सिद्धान्त बनता है। हरिहर!
प्रश्न : आँखों से देखने का मतलब क्या है? उसमें दोनों चीज़ की आवश्यकता है, एक तो प्रकाशमानता और दूसरा ताप?
उत्तर : प्रकाशमानता, आकार आयतन दो चीज़।
प्रश्न : आँख से जब हम देखते हैं, उसमें एक प्रकाशमानता की बात है, और दूसरा ताप की बात है?
उत्तर : आँख में ताप का लेन-देन नहीं है। ताप सभी ओर समान भागता रहता है। ताप सामान्य होने के लिए दौड़ता है। प्रतिबिम्ब को कहीं सामान्य नहीं होना है। इन दोनों का अंतर को रखिए। प्रतिबिम्ब को कहीं भी सामान्य अथवा आवेश दोनों नहीं होना है, प्रतिबिम्ब, प्रतिबिम्ब है, ना ज्यादा है, ना कम है।
प्रश्न : आँख से जो हम देख रहे हैं, उस वस्तु का दिखना नहीं दिखना, इस पर निर्भर करता है कि वो तप्त है या नहीं। उस आधार पर हम इन आँखों से देख पाते हैं या नहीं देख पाते।