उत्तर : आप सभी ओर ससम्मुख है ना। आप अपने में सम्पूर्ण हैं। आप सभी ओर से ससम्मुख हैं। अभी अनुबिम्ब, प्रत्यानुबिम्ब की बात कर सकते हैं। वो genuine है।

प्रश्न : जैसे यहाँ पर एक प्रकाश का स्त्रोत रखते हैं, वो दरवाजे के बाहर जाता है, तो दरवाजा जितना चौड़ा है, वो प्रकाशित भाग उससे थोड़ा ज्यादा चौड़ा होता है, ऐसा नापे हैं, तो ऐसा मानते हैं कि ये जो प्रकाश है किनारे से थोड़ा मूड़ गया, बाहर की तरफ?

उत्तर : किसी का प्रतिबिम्ब, उसका अनुबिम्ब, प्रत्यानुबिम्ब विधि से ये सब व्याख्यायित हो जाते हैं। अनुबिम्ब, प्रत्यानुबिम्ब के बारे में जो आपने जिज्ञासा की थी, उसके लिए अपने को एक दृग बिन्दु नाम की चीज़ को पहचानना पड़ेगा। दोनो आँखों का मिलने पर एक बिन्दु होती है, उस बिन्दु का नाम है दृग बिन्दु। दोनों आँखों की जोड़ जहाँ होता है।

प्रश्न : ये मस्तिष्क के अंदर होता है या बाहर?

उत्तर : आँखों के बाहर होता है ये दृग बिन्दु। भीतर होता है दृग मूल। जो ज्ञानवाही तंतु से जुड़ा रहता है, दृग मूल। दृग बिन्दु बाहर होता है। दृग बिन्दु कहाँ टिकता है? किसी ना किसी बिम्ब के ऊपर जा के टिकता है, अभी ये light के सामने कोई चीज़ आप गेंद रखा, आप light देखने जाओगे तो वो गेंद के ऊपर आपका दृष्टि रूकती है। वो दृष्टि रूकने के पश्चात ये जो प्रकाश आ रहा है, वो इस light को पीछे ले के चले जाएं, और गेंद छोटी होती ही दिखती है। क्यों दिखती है? वो जो गेंद के बाहरी भाग से आई हुई प्रकाश जो है, अनुबिम्ब प्रत्यानुबिम्ब विधि से इन दोनों की दूरी की जो अणु होते हैं, उस पर प्रतिबिंबित हो जाते हैं। अनुबिम्ब क्या है? किसी बिम्ब को लेकर दूसरे के ऊपर उस प्रतिबिम्ब को प्रस्तुत करना, स्थापित करना।

प्रश्न : दो प्रतिबिम्ब, अपना भी किसी दूसरे का भी, दोनों प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसका नाम अनुबिम्ब।

उत्तर : ठीक है। उसी प्रकार प्रत्यानुबिम्ब भी ऐसे ही, होते-होते ये जितना दूरी को जितना चौड़ाई को गेंद घेरा था वो छोटा होता चला जाता है। क्यों होता है? सभी ओर से ये प्रकाश का अनुबिम्ब, प्रत्यानुबिम्ब वो प्रकाश को उन कणों में, उन अणुओं के ऊपर स्थापित कर देते हैं। ये सब प्रकाशमान है, ये सब उजाला है, ऐसा लगने लगता है। किन्तु गेंद उतना ही रहता है। हमको देखने में दूर जाने से छोटा दिखता है, पास आने से गेंद का आकार दिखता है। (जिस जगह पर उसका आकार बिल्कुल बराबर दिखता है) बस वोही दृग बिन्दु है।

प्रश्न : एक और चीज़ है pen को सामने लाते-लाते एक ऐसी स्थिति आती है, कि अब वो दिखता नहीं है?

उत्तर : वो तो आँखों के बिल्कुल पास आ जाने से नहीं दिखेगी। दृष्टिपाट इसका नाम है। दृष्टिपाट, दृग बिन्दु दोनों का योग होने पर वस्तु दिखती है। दृष्टिपाट जो होती है, वो सीधा-सीधा कितना दूर तक फैल सकता है, दोनों तरफ इधर 45°, उधर 45°, 90° को cover किया रहता है। दोनों आँखें मिलकर 90° की कोणों में भागती रहती है। तभी और दूर जा करके बहुत सारा विशाल आकाश दिखाई पड़ती है। ये है दृष्टिपाट, उसके अंदर जो एक चीज़ आता है, जैसा सूर्य उदय हुआ, सूर्य को देखते हैं, वो दृगबिन्दु हो गई। अभी गेंद का बात बताया, ये दृग बिन्दु की वस्तु हो गई।

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