अनुकूल हो जाता है। जो काम दिखने वाला आँखों में दिखता है, जैसा मनुष्य का आँख कम देख पाता है, उसके लिए अनुकूल है ये।
प्रश्न : जैसे एक पारदर्शी काँच है, वो पारदर्शी कैसे बन जाता है? प्रतिबिम्ब उस पार कैसे जाता है?
उत्तर : पारदर्शी का मतलब क्या मानते हो? उस पार से इस पार दिख जाए, परिभाषा तो वैसे ही रखी हुई है। पारदर्शकता के आधार पर उस तरफ जो बिम्ब है, वो इस तरफ भी वैसे ही दिखता है। अपारदर्शकता का मतलब यही है, उस पार जो बिम्ब है, वो इस पार ना दिखे। काँच में वो स्वभाव है, काँच जैसा और कोई चीज़़ plastic बना लो, उसमें भी वो स्वभाव है, उसी प्रकार की पारदर्शकता पानी में होता है। इसी प्रकार और कुछ वैसे चीज़़ बना लें उसमें पारदर्शकता आ ही जाती है।
प्रश्न : पारदर्शकता वस्तु का गुण है?
उत्तर : वस्तु का रचना है। वस्तु का रचना के कारण है।
प्रश्न : किसी चीज़ का प्रतिबिम्ब किसी पारदर्शक वस्तु के आर पार जाता है तो ये कणों के रूप में उसको भेद के नहीं जाता है?
उत्तर : भेदता नहीं, रचना का प्रतिष्ठा है ये, उसको छेद बनाने की प्रतिष्ठा नहीं है।
प्रश्न : क्या ऐसा हुआ, काँच में उसका प्रतिबिम्ब बना, उस प्रतिबिम्ब फिर उस पार और बना?
उत्तर : प्रतिबिम्ब कहाँ बना रहता है, वो जो काँच के इस पार आ गया प्रतिबिम्ब इसी का है नाम पारदर्शी, छोड़-छोड़ करके अपन केवल घूम जाते हैं। कोई चीज़ को सम्बद्ध करके हम कहीं गम्य स्थली तक जा पाएँगें।
प्रश्न : ऐसा मानते हैं आजकल कि प्रकाश कण होता है, या कभी-कभी ऐसा भी मानते हैं तरंग होता है?
उत्तर : भ्रम है ये। प्रकाश तरंग नहीं होता है, तरंग के लिए वस्तु को होना आवश्यक है, अवस्तु कोई तरंग होता नहीं।
प्रश्न : सूर्य से यहाँ तक उष्मा आती है, बीच मे कोई कण नहीं है, काफ़ी जगह space है, और इसके बाद एक कण से दूसरे कण के बीच में जब उष्मा का संचार होता हे, तो उसके बीच मे भी सत्ता है, कोई कण नहीं है धरती में, तो एक कण से दूसरे कण तक जो उष्मा आती है, उसका विधि क्या है?
उत्तर : जो space जिसको कहते हैं, हम कहते हैं सत्ता,सत्ता में कोई चीज़ अपने रूप में ही रहता है, चाहे उष्मा हो, ठंड़ी हो, गर्मी हो, वस्तु हो, अवस्तु हो, जो कुछ भी हो, जो स्थिति हो, गति हो, उसी के स्वरूप में रहता है, सत्ता उसको ना रोकता है, ना टोकता है, ना कम करता है, ना बढ़ाता है, इस सिद्धान्त को पहले लिखो। सूर्य बिम्ब की चारों तरफ जो वातावरण है, उस वातावरण के अंतिम छोर में जो कुछ भी तापमान थी, वो ही तापमान इस धरती के अंतिम छोर के वस्तु में आता है। उसके बाद धरती के वातावरण में जो वस्तुएँ हैं, वो बट लेते हैं ताप को।