उपादेयता, और उसमें कुछ plus minus करना हो जिससे उनको ज़्यादा effective बना के, मानव को दुख से परेशानी से बचा सकें।
उत्तर : ब्रह्माण्डीय किरण सदा-सदा बहता ही रहता है। वो दूर से पास से संबंध नहीं है उसका। ब्रह्माण्डीय किरण सतत् बहाव है। ये कभी रूकते ही नहीं है। उसी भाँति इस धरती पर भी बहुत सारे ब्रह्माण्डीय किरण सम्पर्क में आते हैं। इस धरती से भी ब्रह्माण्डीय किरणों के लिए उपादेयता बनी हुई है। ये अपने को पहचानने की आवश्यकता है। ये पहचानने के उपरांत, जो ब्रह्माण्डीय किरणों का बहाव के साथ, जितने भी भौतिक, रासायनिक परिवर्तन होता है, उसको हम पहचानने की आवश्यकता है।इन भौतिक रासायनिक परिवर्तन के साथ-साथ जीवन अपने आप को अभिव्यक्त करने में, अपने सार्थकता को सिद्ध करने में, जितना अड़चन पैदा होता है, और जितना सुगमता पैदा होता है, उसको निर्धारित करने की बात है। अभी वो समय समीचीन हो गई। अभी आगे ज्योतिष में जो उपलब्धि कराने की बात आती है, वो यही है। उसका ध्रुवीकरण का बिन्दु यही बनता है - मानवीयता पूर्ण आचरण। वो चौखट को ध्यान में रखते हुए, अभी पहले राजा को ध्यान में रखते हुए सारे पाप-पुण्य हो गया, कर्मकाण्ड सबको हम सोचते रहे, वो पर्याप्त नहीं रह गया अब। अब मानवीयता पूर्ण मनुष्य को पहचानते हुए वो सारा कर्म-काण्ड, पाप-पुण्य, को बताने की आवश्यकता आ गई। सही गलती को बताने की आवश्यकता है, और दुर्घटना, सद्घटनाओं को बताने की आवश्यकता आ गई। ये बहुत सटीक उतरने वाली भविष्यवाणी होगी। इसमें हमारा सोचने की तरीका ये है।
प्रश्न : एक आदमी की जिन्दगी में, जिनको हम दुर्घटना मानते हैं या अच्छी घटना मानते हैं, क्यों वे घटती है? कोई विशेष समय में घटती हैं, उसके घटने का जो phenomena है, कैसे घटती है, उसका प्रक्रिया क्या है?
उत्तर : अभी तक की जो बीती-गुजरी खिचड़ी है, उसके अनुसार हम भ्रम विधि से ही सारे बात को ताना-बाना बनाए। इस बीच में कुछ ऐसे भी बात जन्म चुकी है, प्रमाणित हो चुकी है, जैसा ज्योतिष की बात कर रहे हैं। तो हम जागृति पूर्वक ये सब गढ़े हैं, ऐसा नहीं है। ज्योतिष को गढ़ना, जीवन जागृति के बाद हम गढ़े हैं, ऐसा नहीं है। हम जैसे भी थे, उसी से इतने को गढ़े। हमारे में ये भी बात रही, आदिकाल से भी, शुभ की अपेक्षा बनी हुई रही। बहुत आदि काल से, बहुत प्रारम्भिक काल से, कैसे रहा इसको कहा नहीं जा सकता। किंतु मानव जब कभी भी अपने हाथ पैर हिलाना शुरू किया है, तब से शुभ की अपेक्षा तो बनी हुई है। कल्पनाशीलता तो प्रभावशील रहा ही है। तभी तो जंगल युग से, कबीला युग में, ग्राम युग में, ग्राम युग से राजयुग में, राजयुग से और युग में और अभी सर्वोपरि विज्ञानयुग में हम पहुँच चुके हैं। तो ये सब जो है ना हमारा कल्पनाशीलता, कर्म स्वतंत्रता के चलते ये सब चीज़ वैभवों को हम प्रमाणित किया।
प्रमाणित करने के क्रम में हमारा जो गतियाँ जो हैं, पहले की अपेक्षा गतियाँ बढ़ते गई। जब हम पैर से चलने वाली बात थी, उस समय में भी पैर में ठोकर लगती ही रहे। ये नहीं रहा कि पैर में ठोकर नहीं लगा है कभी, ऐसा बात नहीं है। पैदल चलने वालों को भी पैर में ठोकर लगी है। पैदल चलने वाला भी फिसल के गिरा है। हम स्वयं उसमें गवाही हैं। ये सब चीज़ें गुजरता ही रहा है। अभी जो है, गति बढ़ गई। मोटर से गिरेगा तो और कुछ होगा, हवाई जहाज से गिरेगा तो और कुछ होगा। बात ये पता लगता है, यदि वो ही जलयान से यदि गिरेगा तो और कुछ होगा।