उपलब्धि है। पूर्ण जागृत इकाई ही जनजाति में अग्रिम जागृति के लिए गति प्रदायी क्षमता स्थापित करने के लिए समर्थ है साथ ही समुचित शिक्षा प्रणाली, पद्धति एवं नीति को प्रस्थापित करने के लिए अर्ह होती है। इस तथ्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि पूर्ण जागृत मानव ही लोक के लिए अत्यन्त उपयोगी व उपादेयी सिद्ध होता है। ऐसी इकाईयों की संख्या वृद्धि ही लोक मंगल का आधार है।
“मूल्यानुभूति की आशा ’जीवन’ के साथ, आकाँक्षा भ्रांत ज्ञानावस्था के साथ, अनिवार्यता भ्रांताभ्रांत ज्ञानावस्था के साथ अभिव्यक्त होती है।” जीवन अमरत्व के साथ आशा के रूप में होना ज्ञातव्य है। जीवन शरीर को संचालित करता है। इससे पूर्व भी जीवन का अस्तित्व रहते हुए मानव परंपरा में उसकी अभिव्यक्ति पायी नहीं जाती। जबकि मानव शरीर द्वारा अभिव्यक्त होने वाली आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूतियाँ स्पष्ट है। रासायनिक एवं भौतिक सीमा में मानव की पहचान नहीं हुई है। गठनपूर्णता पूर्वक संवेदनशीलता आशा-आकाँक्षा, आवश्यकता-अनिवार्यता के रूप में प्रकट होता है। यह जीवावस्था के अनन्तर ही प्रत्यक्ष हुआ है। चैतन्य जीवन का मूल तत्व संवेदनशीलता और जागृति पूर्वक संज्ञानशीलता है। यही जागृति क्रम में पायी जाने वाली वास्तविकता है। विशेषताएं अपेक्षाकृत गण्य है जो अवस्था चतुष्टय में दृष्टव्य है।
जीवन नित्य और जन्म घटना है। जन्म के साथ मृत्यु स्पष्ट हुई है। प्रत्येक जन्म मृत्यु की ओर गतिमान पाया जाता है। मृत्यु का न होना ही अर्थात् इकाई का संघटित-विघटित न होना ही अमरत्व है। यह होना ही घटना है। जीवन के क्रियाकलाप आशा, विचार, इच्छा अनुभव मूलक होते हैं न कि प्रस्थापन एवं विस्थापन मूलक। प्रस्थापन-विस्थापन क्रिया परमाणु में पाये जाने वाले परिणाम की द्योतक है, जबकि आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभवापेक्षित अथवा अनुभवमूलक क्रियाकलाप परिवर्तन एवं परिमार्जन या पूर्णता की निरंतरता की अभिव्यक्ति है। परिणाम अधिक और कम का प्रमाण है जबकि संवेदनशीलता औचित्य-अनौचित्य का प्रमाण है। औचित्य एवं अनौचित्य पूर्णता एवं परिपक्वता के होने या न होने की अपेक्षाकृत अभिव्यक्ति है। गठनपूर्णता से अधिक इकाई में विकास, क्रियापूर्णता से अधिक अभिव्यक्ति एवं आचरणपूर्णता से अधिक अनुभूति नहीं है। “सही” मात्रा में सीमित नहीं है एवं गलती का अस्तित्व नहीं है। “न्याय” स्वयं में मात्रा नहीं है। अन्याय की स्वीकृति नहीं है। यही सत्यता चैतन्य क्रिया को क्रियापूर्णता और आचरणपूर्णता से सम्पन्न होने के लिए बाध्य की है। यह