21.
विकास व जागृति ही वैभव क्रम है।
मानव शरीर के अर्थ में भी आकार, आयतन, धनोपाधि अपूर्णता का द्योतक है क्योंकि यह भौतिक रासायनिक वस्तुएं हैं। उपाधि का तात्पर्य ही उपाय के लिए बाध्यता है। यहाँ बाध्यता का तात्पर्य रासायनिक, भौतिक वस्तुएं अपने यथास्थिति में उपयोगिता और पूरकता विधि से सार्थक होना स्पष्ट किया जा चुका है। अपूर्णता से पूर्णता को पा लेना ही चैतन्य क्रिया का आद्यान्त उपाय चिंतन का या उपायों की चरितार्थता है। उपयोगितार्थ आय भी उपाय है यथा उपाय पूर्वक ही उपयोग होता है, उपाय पूर्वक ही उत्पादन होता है। उपयोग की चरितार्थता विकास क्रम के अर्थ में, मानव की जागृति क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता के अर्थ में स्पष्ट है।
अपूर्णता ही तृष्णा, तृष्णा ही विकल्पापेक्षा, विकल्पापेक्षा ही सापेक्षता, सापेक्षता ही अपेक्षा, अपेक्षा ही गति, गति ही अग्रिम उदय, अग्रिम उदय ही परिणाम-परिवर्तन-परिमार्जन, परिणाम-परिवर्तन-परिमार्जन ही गठन, क्रिया एवं आचरणपूर्णता है। यही जागृति क्रम और जागृति की आद्यान्त स्थिति है, जिसके संदर्भ में संपूर्ण अध्ययन है। यही दर्शन है।
क्रमिकता ही नियति क्रम है। नियंत्रणपूर्ण गति ही नियति है। क्रमिकता ही गुणात्मक विकास एवं जागृति की श्रृंखला है। गुणात्मक जागृति ही प्रकटन है। यही जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति की अभिव्यक्ति है। अभ्युदय को व्यक्त करना ही अभिव्यक्ति है। रूप, गुण, स्वभाव की वैविध्यता ही अनेक स्थितियों को स्पष्ट करती है। यही स्थितियाँ क्रम से गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता को प्रकट करती हैं। यही त्रिसिद्धियाँ आद्यान्त प्रकृति में पायी जाने वाली उपलब्धियाँ हैं। दर्शन क्षमता का उदय मानव में विशेषत: हुआ है। अशेष प्रकृति प्रकटन है। यही अध्ययन एवं उदय का कारण है। क्रिया में वैविध्यता का समापहरण ही सार्वभौमिकता है। यही मानवीयता का प्रत्यक्ष रूप है। मानव में व्यवहार एवं उत्पादन क्रियाएं प्रसिद्ध हैं। उत्पादन क्रियाओं की सार्वभौमिकता निपुणता एवं कुशलता से अर्थात् उपयोगिता मूल्य एवं सुन्दरता मूल्य के स्थापन करने की सामर्थ्य समानता से, व्यवहार क्रिया में सार्वभौमिकता पाण्डित्यपूर्ण पद्धति से अर्थात् संबंधों में निहित मूल्यों के निर्वाह से है। यही संस्कृति एवं सभ्यता में सार्वभौमिकता का आधार है या यही सार्वभौमिकता है। सार्वभौमिकता ही विरोध की विजय है,