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सतर्कता सजगता पूर्ण परंपरा में मानवीयता सहज चरितार्थता स्वभाव सिद्ध है।
यही व्यक्तित्व एवं प्रतिभा का संतुलन जीवन प्रतिष्ठा है। यही मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता का साकार रूप है, जिसका सामान्यीकरण ही मानव की दश सोपानीय व्यवस्था में सफलता एवं चरितार्थता है। व्यक्ति में सतर्कता, सजगता व्यक्तित्व के रूप में; परिवार में समाधान के रूप में; समाज में अखण्डता के रूप में; सार्वभौम व्यवस्था में निर्विषमता के रूप में; अंतर्राष्ट्र में सहअस्तित्व के रूप में है जिसके लिये ही मानव में चिर पिपासा है।
वादत्रय संयुक्त कार्यक्रम ही अभ्युदय है। प्रत्येक व्यक्ति एवं संस्थायें दश सोपानीय व्यवस्था में अभ्युदयार्थ भागीदार होना जागृति है। साथ ही उन्हीं स्थितियों में व्यक्ति एवं संस्थायें में, से, के लिये दायित्व व कर्त्तव्य निर्वाह करना सहज है। संस्था ही व्यवस्था है, व्यवस्था ही प्रबुद्धता है, प्रबुद्धता ही विधि, नीति व पद्धति है; विधि, नीति व पद्धति ही संस्था है। संस्था की प्रथमावस्था परिवार सभा, द्वितीयावस्था परिवार समूह सभा, तृतीय ग्राम मोहल्ला परिवार सभा, चतुर्थ ग्राम मोहल्ला समूह परिवार सभा, पाँचवाँ क्षेत्र परिवार सभा, छठा मंडल परिवार सभा, सातवाँ मडंल समूह परिवार सभा, आठवाँ मुख्य राज्य परिवार सभा, नवाँ प्रधान राज्य परिवार सभा, दसवाँ विश्व परिवार राज्य परिवार सभा, यही अखण्ड समाज की दश सोपानीय व्यवस्था स्वरूप है। अखण्डता ही समाज का प्रधान लक्षण है।
विगत में भ्रमवश परिवार सीमान्तवर्तीय संस्था में धन के उपार्जन सहित शरीर बल पूर्वक सुरक्षा एवं सदुपयोग के लिये प्रयास हुए है। यही व्यक्ति पूजा परंपरा का कारण है। इस स्थिति में अर्थ की सुरक्षा में असमर्थतावश पराभव का; सदुपयोग में असफलतावश विद्रोह-द्रोह का प्रसव हुआ है। अत: वर्ग संघर्ष के लिए मानव बाध्य हुआ है। यही प्रकारान्तर से वर्गों के रूप में प्रस्फुटित होते गये जिसमें प्रधानत: युद्ध शक्ति का विस्तार अनिवार्य हुआ। ऐसी संस्थाएं राज्यनैतिक पद्धति प्रणाली का प्रयोग करती आ रही है, साथ ही वर्गवाद आचरण एवं व्यवहार को प्रश्रय प्रदान कर रही है। इसके कारण ही अर्थ का दुरूपयोग होना भावी हुआ है।