प्राक्कथन
अस्तित्वमूलक मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान पूर्वक सभी आयाम, कोण, दिशा व परिप्रेक्ष्यों में समाधान और प्रमाण को प्रमाणित करने के लिए अभ्यास दर्शन की आवश्यकता को महसूस किया गया।
अस्तित्व में जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान व मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान इस अभ्यास दर्शन के पहले मानव व्यवहार दर्शन में स्पष्ट किया जा चुका है। यही प्रसन्नता के लिए तथ्य रहा कि हम रहस्य मुक्त विधि से अभ्यास कर सकते हैं। हर विधा में अभ्यास सम्पन्न, प्रमाण पूत होने के पहले से ही अध्ययन विधि से ऊपर कहे दर्शन के सर्वसुलभ होने की संभावना को और सर्वसुलभ होने की आवश्यकता को अनुभव करते हुए इस अभ्यास दर्शन को मानव के सम्मुख रखते हुए प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
मेरा विश्वास है कि हर मानव समझदार, समाधान व समृद्धपूर्वक प्रमाणित होना चाहता है और परिवार व समग्र व्यवस्था में भागीदार होना चाहता है। इस उद्देश्य के लिए यह अभ्यास दर्शन प्रेरक होगा और फलत: उपकार होगा इसी सुनिश्चयता के साथ धरती स्वर्ग हो, मानव देवता हो, मानव धर्मरूपी सुख, समाधान सर्वसुलभ हो, नित्य शुभ हो।
- ए. नागराज
प्रणेता - मध्यस्थ दर्शन ‘सहअस्तित्ववाद’
अमरकंटक, वैशाख शुक्ल तृतीया
श्री संवत् 2061 तद्नुसार
22.04.2004, गुरुवार