3.
अभ्युदय की अनिवार्यता
सर्वतोमुखी विकास ही अभ्युदय है जो सर्व मानव का लक्ष्य है। क्योंकि -
“प्रत्येक भ्रमित मानव कर्म करते समय स्वतंत्र एवं फल भोगते समय परतंत्र है।”
“प्रत्येक मानव गलती करने का अधिकार एवं सही करने का अवसर लेकर जन्मता है।”
“प्रत्येक मानव जन्म से न्याय का याचक है, न्याय प्रदान करने में असमर्थ रहता है।”
“प्रत्येक मानव बौद्धिक समाधान एवं भौतिक समृद्धि चाहता है।”
“प्रत्येक मानव का अकेले में कोई कार्यक्रम स्पष्ट नहीं है।”
“प्रत्येक मानव में अन्य प्रकृति में, से, के लिए की अपेक्षा उपयोग से अधिक उत्पादन क्षमता है।”
“प्रत्येक मानव प्रकृति का अभिन्न अंग है।”
“प्रत्येक मानव सुख, शांति, संतोष एवं आनंदानुभूति चाहता है।”
“प्रत्येक मानव का लक्ष्य विहीन कार्यक्रम नहीं है।”
“प्रत्येक मानव सतर्कता एवं सजगता से परिपूर्ण होना चाहता है।”
चारों आयामों एवं पाँचों स्थितियों की एकसूत्रता एवं समन्वयता ही अभ्युदय का प्रत्यक्ष रूप है, जिसकी संभावना एवं अवसर भी है।
चार आयाम : विचार, व्यवहार, व्यवसाय, अनुभव
पाँच स्थितियाँ : व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, अन्तर्राष्ट्र
आवश्यकता से अधिक उत्पादन पूर्वक भौतिक समृद्धि है, जो उत्पादन का लक्ष्य है।
न्यायपूर्ण व्यवहार (मानवीय मूल्यों का निर्वाह) पूर्वक सहकार्य, सहयोग एवं सहानुभूति है, जिसका प्रत्यक्ष रूप समाज में निर्विषमता या अभय है।