2.
अभ्यास की अनिवार्यता
अभ्युदयार्थ किया गया आयास (आकाँक्षा और हर्ष सहित किया गया प्रयास) ही अभ्यास है। क्यों, कैसे का उत्तर पाने के लिए किया गया बौद्धिक, वाचिक, कायिक क्रियाकलाप अभ्यास है। अर्थात् समाधान सम्पन्न होने के लिए अभ्यास है।
मूल प्रवृत्तियों के परिमार्जन पूर्वक कुशलता एवं पाण्डित्यपूर्ण व्यवहार ही अभ्यास का प्रधान लक्षण है।
व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति विचार के रूप में, परिवार में आचरण के रूप में, समाज में सम्मति व प्रोत्साहन एवं भागीदारी के रूप में, राष्ट्र में शिक्षा व व्यवस्था के रूप में एवं अन्तर्राष्ट्रीय मूल प्रवृत्ति परिस्थिति मानव चेतना के रूप में प्रत्यक्ष है। ये पाँचों स्थितियाँ मानवीय संचेतना में समन्वित, सफल होना पाया जाता है एवं इसके विपरीत अमानवीय प्रवृत्तिवश समस्त समस्याएँ दु:ख रूप में परिवर्तित होती है।
सर्वतोमुखी समाधान ही अभ्युदय है। मानव में समाहित चारों आयाम एवं पाँचों स्थितियाँ सर्वतोमुखी है। इन्हीं की एकसूत्रता ही सर्वतोमुखी समाधान है। यही बौद्धिक समाधान एवं भौतिक समृद्धि श्रमपूर्वक सम्पन्न होता है।
मानव अभ्युदयपूर्ण होते तक अभ्यास के लिए बाध्य है। अभ्युदय ही मानव की आशा, आकाँक्षा एवं लक्ष्य है। यही जागृति क्रम में पायी जाने वाली सत्यता है। इसके अतिरिक्त और कोई व्यवस्था नहीं है। यही सबका अभीष्ट भी है।
मानव जन्म से ही न्याय का याचक, सही कार्य-व्यवहार करने का इच्छुक और सत्यवक्ता होता है। साथ ही वह प्रत्येक कार्य को सही रूप में व्यवहार प्रदान करना चाहता है, जो वस्तुगत सत्य है। यही अभ्यास के लिए अन्त:प्रेरणा है।
न्यायदर्शी व न्याय प्रदायी क्षमता से सम्पन्न होते तक मानव में सभी स्तरों पर स्थिरता, समाधान, संतुलन एवं संयम नहीं पाया जाता है।
मानव में उत्पादन, व्यवहार प्रयोग एवं चिंतनाभ्यास प्रसिद्ध है।