11.
व्यक्तित्व एवं प्रतिभा का संरक्षण ही अर्थ का संरक्षण है।
यही मानव जीवन का आद्यान्त अर्थ है। व्यक्तित्व व प्रतिभा सम्पन्न विचार ही आचरण, व्यवहार, उत्पादन तथा व्यवस्था में भागीदारी में अभिव्यक्त होता है। व्यक्तित्व ही न्याय पूर्ण जीवन है। प्रतिभा स्वयं की स्थिति एवं व्यवस्था में विस्तार ही है। व्यक्तित्व का यह आचरण ही अर्थ का सदुपयोग पूर्वक संरक्षण के रूप में स्पष्ट होना ही प्रतिभा का उदय है जो अनुकरणीय है। व्यक्तित्व और प्रतिभा का संतुलन ही जीवन है, जो सतर्कता एवं सजगता है। मानवीयता में ही व्यक्तित्व पूर्ण होता है। “तात्रय” से अतिरिक्त मानव में, से, के लिये अभिव्यक्ति नहीं है। इसलिए भाव = मौलिकता = स्वमूल्य तथा मूल्याँकन क्षमता = मौलिकता का भास, आभास, प्रतीति व अनुभूति = व्यक्ति की क्षमता, योग्यता, पात्रता = जागृति = वातावरण, अध्ययन और स्वसंस्कार = उत्पादन, व्यवहार, व्यवस्था में भागीदारी = भाव प्रसिद्ध है।
मौलिकता = वस्तु स्थिति व वस्तुगत सत्य = मूल्यांकन क्षमता = आशा, विचार, इच्छा, संकल्प = प्रतिभा = कुशलता, निपुणता, पाण्डित्य = व्यवहार व उत्पादन = व्यक्तित्व = मौलिकता है।
मानव की परस्परता में स्थापित मूल्य + मूल्यांकन योग्यता + निर्वाह क्षमता + शिष्ट मूल्य = मानव मूल्य = व्यवहार है।
वस्तु + दिशा + काल = वस्तुस्थिति सत्य है। रूप + गुण + स्वभाव + धर्म = वस्तुगत सत्य है। यही इकाई की मात्रा है।
सम्पूर्ण प्रकृति वस्तु समूह के रूप में दृष्टव्य है। जड़-चैतन्य के रूप में प्रकृति स्पष्ट है, जो दर्शन सुलभ निर्भ्रमता के लिये आवश्यक तथा आद्यान्त अध्ययन है। सत्ता स्वयं व्यापक एवं चैतन्य प्रकृति में पूर्णता का ज्ञान एवं अनुभूति ही समग्र चैतन्य प्रकृति का अभीष्ट है।
जागृति (निर्भ्रमता) = प्रतिभा + व्यक्तित्व (आहार, विहार, व्यवहार, जागृति व व्यवस्था के अर्थ में होना) का संतुलन है। यही मानव का सफल जीवन है। यही अभ्यास का प्रधान लक्षण है। मानव के द्वारा स्पष्टत: किया जाने वाला मूल्यांकन दर्शन सत्तामय ज्ञानानुभूति ही अभ्यास