43.
समस्त प्रकार के वर्ग की एकमात्र समाधान स्थली मानवीयता ही है।
मानवीयता के अतिरिक्त परंपरा पूर्वक प्रतिष्ठा को प्रकट करने के लिए और कोई आधार नहीं है। मानव का आधार मानवीयता ही है। मानव एवं मानवीयता का अविभाज्य संबंध है। मानव के बिना मानवीयता की अभिव्यक्ति तथा मानवीयता के बिना मानव में वैभव सिद्ध नहीं होता जो वास्तविकता है। मानवीयता में ही मानव की प्रतिष्ठा है अर्थात् परंपरा है। यही मानव धर्म प्रतिष्ठा को स्पष्ट एवं चरितार्थ करती है। अर्थ को आचरित होना ही चरितार्थता है। तन, मन, धन ही मानव में आद्यान्त अर्थ है। धन का आचरण उपयोगिता एवं सुदंरता में, तन का आचरण नवधा शिष्ट मूल्य में एवं मन का आचरण नवधा स्थापित मूल्य में प्रतिष्ठा पाता है। निश्चित लक्ष्य हेतु स्व स्थिति को पाना ही प्रतिष्ठा पाता है। निश्चित लक्ष्य हेतु स्व स्थिति को पाना ही प्रतिष्ठा है। प्रतिष्ठा विहीन स्थिति में लक्ष्य को पाना या लक्ष्य पूर्ण होना प्रमाणित नहीं है। प्रत्येक पूर्णता के अनन्तर पूर्णता का निरंतरता होना प्रमाणित है। पूर्णता केवल तीन ही है। प्रकृति में “पूर्णता त्रय” से अधिक आवश्यकता, अनिवार्यता सिद्ध नहीं होती। जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति का लक्ष्य “पूर्णता त्रय” है। गठनपूर्णता के अनंतर उसकी निरंतरता, क्रियापूर्णता के अनंतर उसकी निरंतरता, आचरणपूर्णता के अनंतर उसकी निरंतरता प्रसिद्ध है। गठनपूर्णता के लिए जड़ प्रकृति श्रमरत हैं। चैतन्य प्रकृति गठनपूर्णता की निरंतरता सहित क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता के लिए आशा, विचार, इच्छा एवं संकल्परत है जो मावन जीवन में प्रमाणित है। प्रत्येक मानव मानवीयता से परिपूर्ण होना चाहता है। यह क्रियापूर्णता पूर्वक चरितार्थ होता है जो वास्तविकता है। प्रत्येक मानव दया, कृपा, करूणामय होना चाहता है। यह आचरणपूर्णता में चरितार्थ होता है। यही वास्तविकता है। यह सत्यता स्वयं प्रमाण है कि पूर्णता के अनन्तर पूर्णता की निरंतरता होती है। यह प्रकृति के विकास क्रम, जागृति क्रम में प्रकट तथ्य है। मानव द्वारा अपूर्ण के योगफल से क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता को पाना संभव नहीं है। स्थापित मूल्यों के योगफल से ही क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता सिद्ध होती है। स्थापित मूल्यों का क्षरण प्रमाणित नहीं है। मूल्यांकन में अधिकार का होना या अधिकार का न होना प्रमाणित है। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि स्थापित मूल्यों की क्षरण विहीनता उसकी पूर्णता का द्योतक है। संपूर्ण स्थापित मूल्य प्रेम