23.
कम्पनात्मक एवं वर्तुलात्मक गति का वियोग नहीं हैं।
प्रत्येक परमाणु में उभय गतियाँ प्रसिद्ध हैं। रासायनिक एवं भौतिक परिवर्तन सीमा पर्यन्त कम्पनात्मक गति की अपेक्षा में वर्तुलात्मक गति का अधिक रहना, रासायनिक सीमा से मुक्त गठनपूर्णता से सम्पन्न परमाणु में वर्तुलात्मक गति की अपेक्षा में कम्पनात्मक गति का विपुल होना पाया जाता है। कम्पनात्मक गति ही स्वागत भाव अर्थात् मूल्य संकेत ग्रहण एवं प्रसारण क्षमता एवं वर्तुलात्मक गति ही आस्वादन भाव को प्रकट करती है। रसों के आस्वादन की स्थिति रासायनिक क्रिया-प्रक्रिया सीमांतवर्ती है। चैतन्य प्रकृति कम्पनात्मक गति सहित स्वागतभाव पूर्वक ही मूल्यों का आस्वादन प्रवृत्ति व प्रमाण हैं। भावग्राही एवं भाव प्रदायी संकेतों का ग्रहण एवं प्रसारण करती है। इस संकेत ग्रहण-प्रसारण क्षमता में गुणात्मक परिवर्तन ही सुसंस्कार है। यही जागृति है, स्वभावात्मक महिमा है। यही वातावरणस्थ मौलिकताओं का संकेत ग्रहण एवं प्रसारण क्रिया कम्पनात्मक गति में ही होता है। यही प्रभावात्मक एवं प्रभावशील गति को प्रकट करता है, वर्तुलात्मक गति दबावात्मक एवं तरंगात्मक गति को प्रदान करती है जो प्रसिद्ध है।
सामाजिकता के मूल में संज्ञानशीलता ही सक्रिय है। जो कम्पनात्मक गति की महिमा है। महानता का विस्तार ही महिमा है। महानता ही जागृति सहज प्रमाण परंपरा है। अस्तित्व वर्तमान ही महानता का प्रधान लक्षण है। अस्तित्व में ही धर्मीयता का वर्तमान होना प्रसिद्ध है। मानव में धर्मीयता सुख है। मानव जब तक सुख धर्मीयता से परिपूर्ण नहीं होता है, तब तक जागृति सहज प्रमाण नहीं है। जागृति पूर्णता ही महिमा सम्पन्नता है। मानव से अधिक महिमा सम्पन्न इकाई नहीं है। मानव ही जागृति पूर्वक प्रमाण प्रस्तुत करते हुए शरीरान्तर भी देवात्मा एवं दिव्यात्मा के पद में स्थित रहना होता है। सम्यकता अर्थात् पूर्णता के लिए जो जिज्ञासा है यही संचेतना है। सम्यकता केवल गठन, क्रिया एवं आचरण ही है। जिसका प्रत्यक्ष रूप ही अमरत्व, सतर्कता एवं सजगता है। सतर्कता की परिपूर्णता ही मानव में अभय एवं विश्वास, समृद्धि एकमात्र उपाय है। आशय पूर्ति के संदर्भ में समझदारी पूर्ण हो जाना ही अभयता है। अभयता ही सामाजिकता की आद्यान्त उपलब्धि है यही संज्ञानशीलता है।